आशापुरा माताजी ने चुनी वागड़ की धरा, ऐसे पहुंची यहां प्रतिमा

wagad darshan aashpura mataji

महिपालसिंह, डूंगरपुर। वागड़ के प्रसिद्ध शक्ति पीठ निठाउवा गामडी स्थित आशापुरा माताजी मंदिर से भक्तों की अनूठी आस्था है। इस प्रतिमा के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु आते हैं। आज हम आपको वागड़ दर्शन के जरिये आप सभी को आशापुरा माताजी मंदिर के बारे में कुछ रोचक बातें बताने जा रहे है, जो इससे पहले आपको शायद ही पता होगी। यह प्रतिमा देशभर में इस लिए विख्यात हैं क्योंकि यह तारागढ़, दिल्ली, मारवाड़, मंदसौर, सांडलपोर होते हुए वागड़ पहुंची। प्रतिमा स्थापना के लिए वागड़ की धरती चुनी गई। चौहान वंश की कुल देवी मां जगदंबा आशापुरा की प्रतिमा विराजमान है। विक्रम संवत 677 माघ शुक्ल द्वितीय को राजस्थान के सांभर के पास देवगिरी पर्वत पर चौहान वंश के राजा माणकराव को आशा पालव के वृक्ष से प्रकट होकर दर्शन दिए थे। तभी भवानी को आशापुरा माताजी के नाम से पूजा व पुकारे जाने लगा है।

जगह जगह पर हुई प्रतिमा की प्रतिष्ठा
कहते हैं कि इसकी सर्वप्रथम प्रतिष्ठा आमेर के चौहान राजा अणोराज ने तारागढ़ में विक्रम संवत 1180 से 1208 के मध्यकाल में करवाई थी। विक्रम संवत् 1236 में पृथ्वीराज तृतीय दिल्ली के राजा बनें। तब इस प्रतिमा को दिल्ली ले जाकर निगम बोध घाट पर पुरोहित गुरुराम से इसकी प्रतिष्ठा करवाई। 1249 में पृथ्वीराज के निधन हो जाने एवं दिल्ली में इस्लामी शासक हो जाने पर पृथ्वीराज के भाई हरराज इस प्रतिमा को रणथम्भौर ले गए। इसके बाद इनके वंशज इस प्रतिमा को सांचौर (मारवाड) ले गए। विक्रम संवत 1380 में शासक मोदपाल ने नाडोल (मारवाड़) में प्राण प्रतिष्ठा करवाई। इसी वंश में मोदपाल नाडोल के शासक बने। चौदहवी शताब्दी में हमलवारों ने मारवाड़ के नाडोल पर आक्रमण कर दिया। काकाजी गंगदेव व मोदपाल ने मिलकर वीरता दिखाई।

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आशापुरा माताजी मंदिर में रात के समय जगमग रोशनी

मोदपाल को आया था सपना…
कहते हैं कि विक्रम संवत 1352 जेठ सुदी अष्ठमी को आशापुरा माता ने मोदपाल को सपना दिया कि मेरी प्रतिमा को रथ में रखकर मालवा की ओर चल दो। जहां पर रथ रूक जाए वहां पर शासन जमा लेना। मोदपाल अपने चार बेटों व काका जैतसिंह के साथ सेना लेकर रथ के साथ रवाना हुए। मंदसौर (मध्यप्रदेश) में रथ का पहिया टूट गया। वहां शासन जमाया। आशापुरा माता की प्रतिमा जीरण में विराजमान की। आज भी वहां पूजा होना बताया जाता है। वहां पर हमला होने पर नया रथ बनाकर मोदपाल आगे बढ़े तो सांडलपोर के पास जंगलो के बीच गुजरते समय रथ का पहिया टूट गया। वहां कुछ समय शासन किया। वहां पर आज भी किला बना हुआ है।

ऐसे पहुंची वागड़ मेंं प्रतिमा
कुछ वर्ष शासन करने के बाद मोदपाल माताजी की प्रतिमा को रथ में रखकर वागड की तरफ बढ़े। भाद्रपद सुदी नवमी को गामडी के पास रथ धरती में उतर गया। मोदपाल रथ के पीछे कुछ दूरी पर चल रहे थे। सेना का पुरा लश्कर मोदपाल के रूकने के स्थान व गामडी के बीच चल रहा था। माताजी का रथ रूकने की सूचना पर मोदपाल जहां थे वहीं थम गए। वहीं मोदपुर गांव बस गया। आज भी उसी नाम से आसपुर से 15 किलोमीटर दूर विजवामाता मार्ग पर गांव स्थित है।

ऐसे बन गए पुजारी
एक बार मंदिर में लसाडिया के चोर हमला व चोरी करने आए। दैवीय शक्ति के कारण सफल नहीं हो सकेंं। इन्होंने आशापुरा माता की सेवा करना स्वीकारा। तब से इनके वंशज पूजारी के रूप में सेवा कर रहे हैं। माताजी का खेड़ा इन्हीं पुजारियों का बसाया गांव है। निठाउवा गामडी आशापुरा माताजी मंदिर में मनोकामना धारण के लिए लोग देश भर से पहुंचते हैं।

लोग पैदल आते हैं दर्शन के लिए
नवरात्री की अष्टमी को दर्शन के लिए राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात से भक्त नंगे पाव आते हैं। इसके अलावा ध्वजा लेकर पदयात्रियों का जत्था यहां पहुंचता हैं। गडा कुम्हारिया गांव से क्षत्रिय समाज के तत्वाधान में रथयात्रा निकलती है। मंदिर के मुख्य द्वार के बाहर से लंबी कतार लगती है। परिसर में सम्राट पृथ्वीराज चौहान की विशाल प्रतिमा स्थापित की है। प्रत्येक माह की शुक्ल पक्ष की अष्ठमी को नवचंडी हवन होता है। हर माह की अष्ठमी, रविवार व मंगलवार को भक्तों की भारी भीड़ रहती है। महाअष्टमी पर विशाल मेले का आयोजन होता है।

दु:ख हरती है आशापुरा माता
कहा जाता है यहां पद दर्शन करने व मनोकामना धारण करने से नि:संतान को संतान मिल जाती है। परिवार की बाधाओं को दूर कर करती है। लोग कहते हैं कि यह प्रतिमा दु:ख हरण का काम करती है। असाध्य रोग दूर होते हैं। इस मंदिर के प्रति भक्तों में अगाध आस्था है। यह मंदिर डूंगरपुर जिले के साबला पंचायत समिति से 16 किमी की दूरी पर निठाउवा गामड़ी में स्थित है।

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