चोर भी भूल गए चोरी करना, पुरातन विभाग ने माना महत्वपूर्ण!

बांसवाड़ा जिले का अंदेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय मंदिर

बांसवाड़ा के अंदेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय मंदिर को वागड़ क्षेत्र में हर कोई जानता है। कार्तिक पुर्णिमा यहां के लिए अहम दिन होता है। इस दिन अंदेश्वर भगवान प्रगट हुए थे। इस प्रतिमा को 12वीं या 13 वीं शताब्दी माना जाता है। पुरातन विभाग ने इस मूर्ति को अध्यात्म की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना है। भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा अंदेश्वर पार्श्वनाथ के नाम से देशभर में विख्यात है। इस प्रतिमा के पीछे कई किंवदंतियां है कि एक बार चोर यहां चोरी करने के लिए आए। चांदी के दरवाजों को निकाल दिया, लेकिन वहां से रवाना होने के साथ अंधे हो गए। सारा सामान वापस मंदिर पहुंचा। उसके बाद एक बार फिर मंदिर की तिजोरी से नकदी चोरी की। अंधे हो जाने के कारण पैसे लेकर यहां वहां भटकते रहे। इस बार भी चोर सफल नहीं हो सकेंं। राशि वापस लौटाने पर नेत्र दृष्टि वापस आई। ऐसे में अब चोरों ने इस मंदिर से दूरी बना ली है। अब इनमें भी इस प्रतिमा के प्रति आस्था का भाव है।

andeshwar parshwanath kushalgarh
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बताते हैं कि मन में आस्था हो, हृदय निश्चल हो तो अंधों को अंदेश्वर पार्श्वनाथ भगवान ने दृष्टि दी है। वर्तमान में समय के साथ इस चमत्कारिक अतिशय प्रतिमा के प्रति आस्था बढ़ती जा रही है। डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर के अलावा गुजरात व मध्यप्रदेश के श्रद्धालुओं के लिए प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया है। यहां तक देशभर से श्रद्धालु मध्यप्रदेश सीमा से यहां दर्शनार्थ के लिए आते रहते हैं।

किवंदती है कि मुलनायक भगवान पार्श्वनाथ की चमत्कारी मूर्ति जनजाति किसानों को खेत में खेती के दौरान मिली थी। खेती के दौरान किसान का हल किसी वस्तु से टकराया था। किसान ने उस वस्तु को खेत से निकाला। तो पत्थर से मिट्टी हटाने पर पता चला कि यह प्रतिमा है। आदिवासी समाज के लोगों ने एकत्रित होकर उत्सवी माहौल में प्रतिमा की पूजा की। अब प्रतिदिन पूजा होने लगी। कहते हैं कि आदिवासी समाज के लोगों की तरफ से उस दौरान नियमित रूप से सिंदुर चढ़ाया जाता था। पाषाण प्रतिमा को एक वृक्ष के नीचे रखा गया था। कलिंजरा के जैन श्रद्धालु को स्वप्न आया था। स्वप्न में मिले आदेश के आधार दूसरे दिन महाजन वहां पहुंचा। अभिषेक व पूजा अर्चना की। श्रद्धालुओं के साथ मिलकर छोटा मंदिर बनाकर प्रतिमा को विराजित किया। 

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बांसवाड़ा जिले में स्थित इस मंदिर की कुशलगढ़ से दूरी 20 किमी, कलिंजरा से आठ किमी है। इस मंदिर की निगरानी व प्रबंधन कुशलगढ़ जैन समाज की तरफ से किया जाता है। काले रंग की भगवान अंदेश्वर पार्श्वनाथ की प्रतिमा 30 इंच ऊंची है। ऐसी प्रतिमा भारत देश में मात्र एक बताई जा रही है। अन्देश्वर पार्श्वनाथ के फण के ऊपर पंच बालयति भगवान विराजित है।

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हर वर्ष अंदेश्वर पार्श्वनाथ पर लगने वाले दो दिवसीय मेले में मध्यप्रदेश, गुजरात व राजस्थान से भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। आसपास के गांवों के ग्रामीण भी मेले का लुत्फ उठाते हैं। किसान गन्ना व अपनी फसल लेकर यहां आते हैं। भगवान के समक्ष फसल को चढ़ाया जाता है। यहां मनोकामना धारण की जाती है। मान्यता है कि यहां पर मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है। ऐसे में देशभर में काफी प्रसिद्धि मिली है। इसके अलावा वागड़ के गांवों व पड़ोसी मध्यप्रदेश से लोग दर्शनार्थ के लिए पदयात्री के रूप में यहां पहुंचते हैं। मंदिर में ध्वजा चढ़ाते हैं।

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