150 परिवार में हर घर से एक व्यक्ति विदेश..

डूंगरपुर। जीवन में हर कोई एक बार विदेश जाने की चाह रखता है। विदेश में रोजगार मिलना भी कोई आसान काम नहीं है। पहली बार विदेश जाने वाले युवाओ को रोजगार के लिए कई दिन तक भटकना पड़ता है। डूंगरपुर जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां 150 परिवारों में हर घर से एक व्यक्ति रोजगार की चाह में विदेश रहता है। जिला मुख्यालय से सात किमी की दूरी पर स्थित मोकरवाड़ा गांव के युवा कतर, कुवैत, इजरायल, बहरीन, इराक आदि देशों में कार्य कर रहे हैं। इस गांव…

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एक हजार वर्ष पुरानी है मोड़ी माता की प्रतिमा

विशाल कलाल। वागड़ में ऐसे मंदिर व प्रतिमाएं है जो अब तक गुमनानी में है। जिनके बारे में श्रद्धालु अब तक अनभिज्ञ है। जो एक हजार वर्ष से अधिक पुराना है। बहुत कम लोग ही इन चमत्कारिक प्रतिमाओं के बारे में जानते हैं। डूंगरपुर में आंतरी—सुराता मार्ग पर स्थित मोडी माता का मंदिर भी कुछ ऐसा ही है। जहां दर्शन करने से असाध्य बीमारियां दूर हो जाती है। लोगों के संकट टल जाते है। इस प्रतिमा के चौखट तक पहुंचने पर हर समस्या का समाधान निकलने की बात बुजुर्ग बताते…

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क्या जानते है आप, डूंगरपुर में है लंदन…

लंदन इग्लैंड की राजधानी है। सबसे अधिक आबादी वाला खूबसूरत शहर। गगनचुंबी इमारते, टावर आॅफ लंदन, लंदन अंडरग्राउंड यहां की शान है। पर, किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि डूंगरपुर में भी लंदन हो सकता है। लंदन वाले सोचते होंगे कि डूंगरपुर ने हमारे शहर को कैद कर लिया है। बनकोडा—आसपुर मार्ग पर मुख्य मार्ग पर एक गांव है नरणिया। जिसे लंदन के नाम से जाना जाता है। 1700 की आबादी वाला गांव है। लंदन जैसी ऐसी कोई बात नहीं है। गांव के साइन बोर्ड पर लंदन जरूर नजर…

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जिसने ये नहीं खाया, उसकी जिदंगी किस काम की…

डूंगरपुर। मेहंदी रंग लाती है, सूख जाने के बाद। चना खाने की याद आती है, निकल जाने के बाद। फूल है गुलाब का, कली किस काम की, जिसने चने नहीं खाये, उसकी जिंदगी किस काम की। तेल के पीपों को काटकर बनाए गए डिब्बों पर यह पंक्तियां नजर आती है। इन पक्तियों के साथ नवल भाई का चना मसाला का व्यापार बरसों से चल रहा है। इनकी अपनी चलती फिरती दुकान है। नवलभाई चने वाले को डूंगरपुर शहर के बुजुर्ग, अधेड़ समेत ग्रामीण अंचल में हर कोई जानता है। यह…

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दिवाली पर कैसे चेहरे पर आती है मुस्कुराहट!

वागड़ में मेरियू की परंपरा नववर्ष यानि गोवर्धन पूजा के दिन तड़के पांच बजे से शुरू हो जाती है। यहां बच्चों की तरफ से आल दिवारी, काल दिवारी, पमणे दाड़े घोर दिवारी, मेरियू..मेरियू..मेरियू का संबोधन किया जाता है। इससे आगे की पक्तियां सुनना भी रोचक होता है। बच्चों द्वारा संबोधन के पास मेरियू में तेल पुरवने के साथ सिक्कों का आना ही चेहरे पर मुस्कुराहट ला देता है। आपके लिए हम पुरा वीडियो लेकर आए है।

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यहां 250 वर्ष पूर्व खुदाई में मिला मिट्टी का दीपक और खंडहर मंदिर

dungarpur

दीपावली पर्व पर विशेष : वागड़ का महालक्ष्मी माता मंदिर डूंगरपुर जिले में पहाड़ों पर ही देवी मंदिर देखने को मिल जाएंगे। इस दीपावली पर्व पर हम आपको वागड़ के ऐसे महालक्ष्मी मंदिर के बारे में बताने जा रहा है, जो सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा, लेकिन 200 वर्ष पहले तक गुमनाम सा रहा। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से सीमलवाड़ा मार्ग पर 46 किमी की दूरी पर स्थित झलाई गांव में करीब 250 वर्ष पूर्व पहाड़ी पर खुदाई के दौरान मिट्टी का दीपक एवं मंदिर का खंड़हर मिला था।…

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नी मल्यो हेड़ों, इतना लंबा है वागड़ का हेड़ा गीत

राजेश पटेल, डूंगरपुर। ‘हेड़ा’ गीत नाम थोड़ा अजीब जरूर है, लेकिन नामकरण के पीछे भी एक तथ्य है। वागड़ में कहते हैं कि हेड़ों नी मल्यो। मतलब जिसका अंतिम छोर नहीं मिलता है। यह गीत ऐसा है कि शुरू होने के बाद इसका अंत नहीं होता है। यह गीत इतना लंबा है कि दो से तीन दिन लगातार गाने के बाद भी खत्म नहीं होता है। इसे वागड़ी बोली में ही गाया जाता है। जनजाति बहुल डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में कई बुजुर्ग इसे गाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के लोगों को…

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आवी गया पामणा, दिवारी आणू हे…

दिवाली आणा की अनूठी परपंरा सिर्फ वागड़ के डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिले में देखने को मिलती है। नवदंपत्ति की पारिवारिक जीवन की शुरुआत इस दिन से होती है। यह खास परंपरा नव दम्पति के लिए ही है। इस साल शादी करने वाले पुरुष ससुराल अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ पत्नी को लेने जाता है। यहां सभी का स्वागत व मान मनुहार किया जाता है। मिठाई बांटी जाती है। हंसी—ठिठोली होती है। पटाखे छोड़कर खुशियां मनाई जाती है। उस दौरान दुल्हे को भेंट स्वरूप आभूषण व वस्त्र दिए जाते हैं।…

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जाने क्या है थाणा की रामणा रस्म…

वागड़ अंचल में दीपावली पर्व पर कई परंपरा व रीति​ रिवाज है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से पांच किमी की दूरी पर स्थित है थाणा गांव। कभी इस गांव को शाला शाह थाणा कहा जाता था। इस गांव में दीपावली पर्व अनूठे तरीके से मनाया जाता है। यहां गन्ने और पताशे बांटकर दिवाली मनाई जाती है। जिसे स्थानीय बोली में रामणा कहते हैं। बताते हैं कि गांव के चौराहे पर सभी जाति धर्म के लोग एकत्रित होते हैं। किसान अपनी अपनी इच्छानुसार गन्ने की भारियो को रखते हैं। यहां गन्ने के…

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यहां पशु भी मनाते हैं दिवाली, होती है दौड़

राजेश पटेल, डूंगरपुर। त्योहारों पर राजस्थान जैसी परंपराएं आपको कहीं पर भी देखने को नहीं मिलेगी। यहां दीपावली पर्व पर पशु भी त्योहारों का हिस्सा बनते हैं। वागड़ के गांव—गांव में पशु दौड़ की परंपरा बरसों से चली आ रहा है। गायों को कच्चों रास्तों व मुख्य मार्ग पर दौड़ाया जाता है। दौड़ में जो पशु सबसे आगे निकलता है, उसके आधार पर वर्ष के सुखमय रहने की भविष्यवाणी की जाती है। छापी गांव के रामेश्वर पाटीदार ने बताया कि जिस रंग की गाय आगे निकलती है उससे नया वर्ष…

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