यहां 250 वर्ष पूर्व खुदाई में मिला मिट्टी का दीपक और खंडहर मंदिर

dungarpur

दीपावली पर्व पर विशेष : वागड़ का महालक्ष्मी माता मंदिर

डूंगरपुर जिले में पहाड़ों पर ही देवी मंदिर देखने को मिल जाएंगे। इस दीपावली पर्व पर हम आपको वागड़ के ऐसे महालक्ष्मी मंदिर के बारे में बताने जा रहा है, जो सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा, लेकिन 200 वर्ष पहले तक गुमनाम सा रहा। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से सीमलवाड़ा मार्ग पर 46 किमी की दूरी पर स्थित झलाई गांव में करीब 250 वर्ष पूर्व पहाड़ी पर खुदाई के दौरान मिट्टी का दीपक एवं मंदिर का खंड़हर मिला था। इस मंदिर के स्थान पर वर्षो तक दीपक प्रज्जवलित होता था।

ग्रामीणों के माध्यम से आसपास के गांवों तक खंड़हर मंदिर मिलने की जानकारी मिली। लोग एकत्रित हुए। मंदिर से जुड़े जानकारों को बुलाया। डामोर समाज के पुर्वजों की बैठक 250 वर्ष पूर्व इसी पहाड़ी पर हुई। समाज ने वंशावली भाट को बुलाया।पहाड़ी को देखने व खंहडर मंदिर को देखने पर पता चला कि यह पहले महालक्ष्मी माता का मंदिर था। महालक्ष्मी माता डामोर सिसोदिया डामोर समाज की कुलदेवी है। इस दौरान लोगों ने माताजी की तस्वीर स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू कर दी। राजस्थान व गुजरात के 52 गांवों के डामोर समाज का आस्था का केंद्र बन गया। इस मंदिर ने 52 गांवों को आपस में अटूट संबंध बना रखा है। खंडहर मंदिर की स्थिति देखने पर पता चला कि यह 600 से करीब एक वर्ष हजार पहले भी यहां पूजा अर्चना होती थी।

पहाड़ी पर धन की देवी लक्ष्मी माता की उपस्थिति होने के कारण इसे लक्ष्मी माता पहाड़ के नाम से जाना जाता है। ग्रामीण इस पहाड़ को इसी नाम से पुकारते हैं। पहाड़ी के पास में एक ओर तालाब बना हुआ है, दूसरी तरफ जंगल नजर आता है। पहाड़ी से मनोहार दृश्य व प्रकृति का खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है। गुजरात से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच कर मनोकामना धारण करते है। मनोकामना पूर्ण होने पर चांदी का छत्तर व नारियल का तोरण चढ़ाते हैं।

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वर्ष 1962 में मंदिर निर्माण का मु​हूर्त किया गया। वर्ष 1993 में मंदिर निर्माण का शुभारंभ किया गया। वर्ष 1999 में मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा कराई गई। महालक्ष्मी माता की प्रतिमा को मकराना से तैयार करवा कर लाया गया। गेमा पुत्र दोला डामोर व भेमा पुत्र अर्जन डामोर मंदिर में पूजा अर्चना का कार्य करते है। समाज ने इन दोनों को सुबह व शाम की जिम्मेदारी सौंपी है। मंदिर प्रांगण में हवन कुंड बना हुआ है। लोगों की मांग व आवश्यकता महसूस होने पर अतिरिक्त कार्य किए जा रहे हैं।

ग्राम पंचायत झलाई के सरपंच बाबुलाल डामोर ने बताया कि महालक्ष्मी माता डामोर समाज के 52 गांवों की कुलदेवी है। इसलिए यहां धार्मिक आयोजन होते रहते है। इसके अलावा अब जिले भर से श्रद्धालुओं का पहुंचना होने लगा। लोग अब इस मंदिर को जानने लगे। बरसों से माताजी इस पहाड़ी पर विराजित थी। धनतेरस से लेकर दीपावली पर्व तक मंदिर पर श्रद्धालुओं की आवाजाही अधिक रहती है। यहां विविध अनुष्ठान वर्षभर होते हैं।

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