क्या आप जानते है वागड़ की महिला किसान मॉडल को

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वागड़ की महिला किसान ने दिल्ली में गाया “वडाली तारे खुस जाहे मु नानी परणाई” राजेश पटेल,डूंगरपुर। किसानों को याद करने के लिए सिर्फ किसान दिवस ही नहीं है। अन्नदाता को याद करने के लिए हर दिन महत्वपूर्ण है। वागड़ ​के किसान खेती में जो नवाचार कर रहे हैं वह काबिले तारीफ है। किसी ने क्या खूब लिखा है, “कर दिखाओ कुछ ऐसा कि दुनिया करना चाहे आपके जैसा ” ऐसा ही कुछ करके दिखाया है वागड़ की शांता पटेल ने। इस महिला किसान को दूरदर्शन चैनल द्वारा राष्ट्रीय महिला…

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पायलट बोले, धर्मो के ठेकेदार मंदिर जाते तो क्या बुरा होता!

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डूंगरपुर। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट ने कहा कि पीएम बेणेश्वर धाम पर भाषण देकर चले गए। मंदिर में हाथ जोड़कर चले जाते तो क्या बुरा होता। यह धर्मो के ठेकेदार बनते है, मंदिर जाना क्यों भूल गए! आखिर जगह का चयन क्यों किया। ​बहुत बड़ा धाम है। लोग शामिल हो जाएगे, इसलिए सभा कर दी। इससे तो खेत में ही सभा कर लेते। यह मंगलवार को चौरासी विधानसभा क्षेत्र के कुआं गांव में चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रदेश में घमंड का…

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क्या आपने देखा है यह स्कूल, जिसकी दीवारें बोलती है…

डूंगरपुर जिले का हिम्मतपुरा राजकीय प्राथमिक विद्यालय

-टाई पहने, आई कार्ड लटकाए अध्ययन करते हैं विद्यार्थी सरकारी स्कूलों की स्थिति से हर कोई वाकिफ है। यहां कक्षाकक्षों के साथ संसाधनों की कमी झेलनी पड़ती है। राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में एक सरकारी प्राथमिक स्कूल ऐसा भी है जो निजी विद्यालयों को भी मात देता है। इसे देखकर सरकारी स्कूल के प्रति हर किसी की सोच बदल जाती है। इस स्कूल के विद्यार्थी टाई पहने, गले में आई कार्ड लटकाए निजी स्कूलों की तरह अध्ययन करते नजर आते हैं। डूंगरपुर जिले के हिम्मतपुरा राजकीय प्राथमिक विद्यालय की हिम्मत…

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नीला पानी, बस इस पल का होता है वर्षभर इंतजार…

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राजेश पटेल, डूंगरपुर। मेला हमारी संस्कृति का हिस्सा है। गांवों में लगने वाले मेले में ग्रामीण संस्कृति का दर्शन होता है। बेणेश्वर व रथोत्सव के बाद नीलापानी मेले की पहचान बरसों से कायम है। परंपराओं पर आधारित यह मेला ऐतिहासिक है। देव दिवाली का यह मेला पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है। यहां तक कई प्रतियोगी परीक्षाओं में इस पर सवाल पूछा जा चुका है। वर्षभर साधु इस नीलापानी मेले के आने का इंतजार करते हैं। कई साधु पैदल चलकर यहां पहुंचते हैं। यहां चौदस को कुंड में स्नान के लिए…

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जिसने ये नहीं खाया, उसकी जिदंगी किस काम की…

डूंगरपुर। मेहंदी रंग लाती है, सूख जाने के बाद। चना खाने की याद आती है, निकल जाने के बाद। फूल है गुलाब का, कली किस काम की, जिसने चने नहीं खाये, उसकी जिंदगी किस काम की। तेल के पीपों को काटकर बनाए गए डिब्बों पर यह पंक्तियां नजर आती है। इन पक्तियों के साथ नवल भाई का चना मसाला का व्यापार बरसों से चल रहा है। इनकी अपनी चलती फिरती दुकान है। नवलभाई चने वाले को डूंगरपुर शहर के बुजुर्ग, अधेड़ समेत ग्रामीण अंचल में हर कोई जानता है। यह…

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दारू दुकड़ा आलवा वारा, लोकतंत्र ना हैं इ हत्यारा।

बांसवाड़ा। गुजराती में ‘जो बका’ के संबोधन की तरह वागड़ी में ‘ए…हामरो’ (ए सुनो) संबोधन प्रसिद्ध है। इस टेगलाईन को ​बांसवाड़ा निर्वाचन विभाग ने अपनाया है। इनका यह नवाचार बिल्कुल हटकर है। राजनेताओं के हाइटेक चुनाव प्रचार के बीच बांसवाड़ा निर्वाचन विभाग की मतदाता अपील पर हर किसी की नजर जा रही है, कारण मतदाता अपील का अनूठा तरीका । ए…हामरो’…की यह स्टीकर श्रृंखला भावनात्मक अपील के रूप में मतदाता को मतदान से जोड़ने के लिए सटीक है। इसकी चर्चा भी हर जगह हो रही है। वहीं निर्वाचन विभाग भी…

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मौत पर मुआवजा का खेल, यहां घर में रख दी जाती है लाश..

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उदयपुर। अरावली की पहाड़ियों में बसे डूंगरपुर, बांसवाड़ा, उदयपुर जिले समेत जनजाति अंचल में मौताणा की गूंज सुनने को मिलती है। मौताणा प्रथा आदिवासियों का अपना कानून है। यहां किसी व्यक्ति की मौत होने पर जिम्मेदार लोगों से राशि वसूली जाती है। यह राशि लाखों में होती है। शव को जिम्मेदार व्यक्ति के घर—आंगन में रख जाता है। जब तक राशि वसूली नहीं की जाती है, तब तक शव को आंगन से उठाया नहीं जाता है। कभी कभी चार से पांच दिन तक शव रखा रहता है। मौताणा तय होने…

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वागड़ की शख्सियत नाथूसिंह राठौड़, जिन्हें इंडियन आर्मी करती है याद..

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अकबर के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले जयमल राठौड़ के वंशज वागड़ के लेफ्टिनेंट जनरल नाथूसिंह राठौड़ एक ऐसी शख्सियत थी जो अपने कार्य के प्रति कभी लापरवाह नहीं रहे। इनकी ईमानदारी व देशभक्ति ऐसी थी कि कई लोग इन्हें आज भी अपना आदर्श मानते हैं। इनका उत्साह व मेहनत देखकर हर कोई अचरज में पड़ जाता था। चाहे कितना बड़ा अधिकारी क्यों न हो, वह अपनी बात कहने में कभी हिचकिचाते नहीं थे। लोग बताते हैं कि साहस व स्वाभिमान इनका आभूषण था। इनका जन्म रियासतकाल में डूंगरपुर के गुमानपुरा…

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घर घर में यहां के पत्थर, तभी कहते हैं बलवाड़ा की पट्टियां

डूंगरपुर। वागड़ की धरा प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर है। यहां आपको भांति भाति के पत्थर, वनस्पति व मिट्टी नजर आएगी। बलवाड़ा की पट्टिया बरसों से वागड़ की पहचान रही है। वागड़ के गांव, ढाणियो, फलों, बस्तियों से लेकर मंदिरों में बलवाड़ा की पहचान झलकती है। बरसो पहले इन पत्थरों को हथौड़े व टांकले से निकाला जाता था। अब इसके लिए नये तरीके इजाद किए है। पुराने घरों की फर्श पर यह पत्थर नजर आ जाएगा।  गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि डूंगरपुर के कई घरों में यही पत्थर है। बलवाड़ा…

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अरे वाह…नासिक के पौधों से डूंगरपुर में हो रही अनार की खेती..

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कर्तव्य शाह, डूंगरपुर। कभी सोचा भी नहीं था कि हमारे खेतों में अनार की पैदावार हो सकेगी। हमारे खेत भी अनार के लिए तैयार हो सकते हैं, लेकिन आज खेतों में अनार की फसल नजर आ रही है। यह कहना है डूंगरपुर जिले के भचडिया गांव के किसान अभयसिंह डामोर का। राजस्थान के डूंगरपुर जिले का भ​चडिया गांव पड़ोसी गुजरात से करीब 10 किमी की दूरी पर है। अभयसिंह का गुजरात राज्य के बोरवाई गांव में जाना हुआ। वहां देखा कि पाटीदार समाज अनार की बढ़िया खेती कर रहा है।…

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