चारपाई पर नाचते हैं यह घोड़े, चाल को मदमस्त व मनमोहक बनाने पूरा परिवार करता है देखभाल

vagad darshan tufan

जिला मुख्यालय से छह किमी दूर थाणा गांव में काठियावाडी व मारवाड़ी नस्ल के घोड़े, तीन दशक से ढोली परिवार घोड़ों के जरिये कर रहा गुजारा , बादल, तूफान, राजा, शेर, धनराज, बिजली, शहरी तूफान है घोड़ों के नाम डूंगरपुर। महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का नाम हर कोई जानता है। राजाओं के शासनकाल में घोड़ा शानो शौकत की पहचान था। युद्ध से लेकर शुरवीरता में घोड़ों का नाम लिया जाता है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से छह किमी की दूरी पर स्थित थाणा गांव में ढोली परिवार घोड़े के जरिये अपने परिवार…

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चोर भी भूल गए चोरी करना, पुरातन विभाग ने माना महत्वपूर्ण!

बांसवाड़ा जिले का अंदेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय मंदिर

बांसवाड़ा के अंदेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय मंदिर को वागड़ क्षेत्र में हर कोई जानता है। कार्तिक पुर्णिमा यहां के लिए अहम दिन होता है। इस दिन अंदेश्वर भगवान प्रगट हुए थे। इस प्रतिमा को 12वीं या 13 वीं शताब्दी माना जाता है। पुरातन विभाग ने इस मूर्ति को अध्यात्म की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना है। भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा अंदेश्वर पार्श्वनाथ के नाम से देशभर में विख्यात है। इस प्रतिमा के पीछे कई किंवदंतियां है कि एक बार चोर यहां चोरी करने के लिए आए। चांदी के दरवाजों को निकाल दिया,…

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क्या आपने देखा है यह स्कूल, जिसकी दीवारें बोलती है…

डूंगरपुर जिले का हिम्मतपुरा राजकीय प्राथमिक विद्यालय

-टाई पहने, आई कार्ड लटकाए अध्ययन करते हैं विद्यार्थी सरकारी स्कूलों की स्थिति से हर कोई वाकिफ है। यहां कक्षाकक्षों के साथ संसाधनों की कमी झेलनी पड़ती है। राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में एक सरकारी प्राथमिक स्कूल ऐसा भी है जो निजी विद्यालयों को भी मात देता है। इसे देखकर सरकारी स्कूल के प्रति हर किसी की सोच बदल जाती है। इस स्कूल के विद्यार्थी टाई पहने, गले में आई कार्ड लटकाए निजी स्कूलों की तरह अध्ययन करते नजर आते हैं। डूंगरपुर जिले के हिम्मतपुरा राजकीय प्राथमिक विद्यालय की हिम्मत…

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कभी गोकुल-मथुरा कहलाती थी वागड़ की यह जगह…

राजेश पटेल, डूंगरपुर। जब आराध्य भगवान श्रीकृष्ण का नाम आता है तो गोकुल व मथुरा जेहन में आ जाता है। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधा की प्रतिमा विराजित होती है, लेकिन वागड़ में एक गांव ऐसा है जिसके नाम में ही भगवान श्याम बिराजते हैं। डूंगरपुर जिले के बिछीवाड़ा पंचायत समिति में स्थित नवलश्याम गांव वर्तमान में राधाकृष्ण मंदिर से पहचाना जाता है। गांव के राधाकृष्ण मंदिर काशी के कारीगरों की मदद से तैयार किया है। इस मंदिर को गोकुल, मथुरा की तरह हुबहु बनाने का प्रयास किया गया…

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सात बैलगाडी टूटी, फिर स्थापित कर दी प्रतिमा

डूंगरपुर जिले का प्रसिद्ध मांडविया हनुमान मंदिर

राजेश पटेल व विशाल कलाल की संयुक्त रिपोर्ट : डूंगरपुर जिले का चमत्कारिक मांडविया हनुमान मंदिर आस्था का ऐसा परम धाम है, यहां भक्त की हर मनोकामना पूर्ण होती है। जिला मुख्यालय से 26 किमी की दूरी पर स्थित इस मंदिर में हर शनिवार को श्रद्धालुओं का मेला लगता है। सिर्फ डूंगरपुर—बांसवाड़ा ही नहीं, विभिन्न स्थानों से लोग दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी किवदंती यह है कि देवली माता टेम्बा के पास किसी आदिवासी समाज के व्यक्ति को स्वप्न आया। घटिया घरा स्थित क्षेत्र में हनुमानजी…

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क्या जानते है आप, डूंगरपुर में है लंदन…

लंदन इग्लैंड की राजधानी है। सबसे अधिक आबादी वाला खूबसूरत शहर। गगनचुंबी इमारते, टावर आॅफ लंदन, लंदन अंडरग्राउंड यहां की शान है। पर, किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि डूंगरपुर में भी लंदन हो सकता है। लंदन वाले सोचते होंगे कि डूंगरपुर ने हमारे शहर को कैद कर लिया है। बनकोडा—आसपुर मार्ग पर मुख्य मार्ग पर एक गांव है नरणिया। जिसे लंदन के नाम से जाना जाता है। 1700 की आबादी वाला गांव है। लंदन जैसी ऐसी कोई बात नहीं है। गांव के साइन बोर्ड पर लंदन जरूर नजर…

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जिसने ये नहीं खाया, उसकी जिदंगी किस काम की…

डूंगरपुर। मेहंदी रंग लाती है, सूख जाने के बाद। चना खाने की याद आती है, निकल जाने के बाद। फूल है गुलाब का, कली किस काम की, जिसने चने नहीं खाये, उसकी जिंदगी किस काम की। तेल के पीपों को काटकर बनाए गए डिब्बों पर यह पंक्तियां नजर आती है। इन पक्तियों के साथ नवल भाई का चना मसाला का व्यापार बरसों से चल रहा है। इनकी अपनी चलती फिरती दुकान है। नवलभाई चने वाले को डूंगरपुर शहर के बुजुर्ग, अधेड़ समेत ग्रामीण अंचल में हर कोई जानता है। यह…

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दिवाली पर कैसे चेहरे पर आती है मुस्कुराहट!

वागड़ में मेरियू की परंपरा नववर्ष यानि गोवर्धन पूजा के दिन तड़के पांच बजे से शुरू हो जाती है। यहां बच्चों की तरफ से आल दिवारी, काल दिवारी, पमणे दाड़े घोर दिवारी, मेरियू..मेरियू..मेरियू का संबोधन किया जाता है। इससे आगे की पक्तियां सुनना भी रोचक होता है। बच्चों द्वारा संबोधन के पास मेरियू में तेल पुरवने के साथ सिक्कों का आना ही चेहरे पर मुस्कुराहट ला देता है। आपके लिए हम पुरा वीडियो लेकर आए है।

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यहां 250 वर्ष पूर्व खुदाई में मिला मिट्टी का दीपक और खंडहर मंदिर

dungarpur

दीपावली पर्व पर विशेष : वागड़ का महालक्ष्मी माता मंदिर डूंगरपुर जिले में पहाड़ों पर ही देवी मंदिर देखने को मिल जाएंगे। इस दीपावली पर्व पर हम आपको वागड़ के ऐसे महालक्ष्मी मंदिर के बारे में बताने जा रहा है, जो सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा, लेकिन 200 वर्ष पहले तक गुमनाम सा रहा। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से सीमलवाड़ा मार्ग पर 46 किमी की दूरी पर स्थित झलाई गांव में करीब 250 वर्ष पूर्व पहाड़ी पर खुदाई के दौरान मिट्टी का दीपक एवं मंदिर का खंड़हर मिला था।…

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नी मल्यो हेड़ों, इतना लंबा है वागड़ का हेड़ा गीत

राजेश पटेल, डूंगरपुर। ‘हेड़ा’ गीत नाम थोड़ा अजीब जरूर है, लेकिन नामकरण के पीछे भी एक तथ्य है। वागड़ में कहते हैं कि हेड़ों नी मल्यो। मतलब जिसका अंतिम छोर नहीं मिलता है। यह गीत ऐसा है कि शुरू होने के बाद इसका अंत नहीं होता है। यह गीत इतना लंबा है कि दो से तीन दिन लगातार गाने के बाद भी खत्म नहीं होता है। इसे वागड़ी बोली में ही गाया जाता है। जनजाति बहुल डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में कई बुजुर्ग इसे गाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के लोगों को…

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