आवी गया पामणा, दिवारी आणू हे…

दिवाली आणा की अनूठी परपंरा सिर्फ वागड़ के डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिले में देखने को मिलती है। नवदंपत्ति की पारिवारिक जीवन की शुरुआत इस दिन से होती है। यह खास परंपरा नव दम्पति के लिए ही है। इस साल शादी करने वाले पुरुष ससुराल अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ पत्नी को लेने जाता है। यहां सभी का स्वागत व मान मनुहार किया जाता है। मिठाई बांटी जाती है। हंसी—ठिठोली होती है। पटाखे छोड़कर खुशियां मनाई जाती है। उस दौरान दुल्हे को भेंट स्वरूप आभूषण व वस्त्र दिए जाते हैं।…

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यहां पशु भी मनाते हैं दिवाली, होती है दौड़

राजेश पटेल, डूंगरपुर। त्योहारों पर राजस्थान जैसी परंपराएं आपको कहीं पर भी देखने को नहीं मिलेगी। यहां दीपावली पर्व पर पशु भी त्योहारों का हिस्सा बनते हैं। वागड़ के गांव—गांव में पशु दौड़ की परंपरा बरसों से चली आ रहा है। गायों को कच्चों रास्तों व मुख्य मार्ग पर दौड़ाया जाता है। दौड़ में जो पशु सबसे आगे निकलता है, उसके आधार पर वर्ष के सुखमय रहने की भविष्यवाणी की जाती है। छापी गांव के रामेश्वर पाटीदार ने बताया कि जिस रंग की गाय आगे निकलती है उससे नया वर्ष…

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दारू दुकड़ा आलवा वारा, लोकतंत्र ना हैं इ हत्यारा।

बांसवाड़ा। गुजराती में ‘जो बका’ के संबोधन की तरह वागड़ी में ‘ए…हामरो’ (ए सुनो) संबोधन प्रसिद्ध है। इस टेगलाईन को ​बांसवाड़ा निर्वाचन विभाग ने अपनाया है। इनका यह नवाचार बिल्कुल हटकर है। राजनेताओं के हाइटेक चुनाव प्रचार के बीच बांसवाड़ा निर्वाचन विभाग की मतदाता अपील पर हर किसी की नजर जा रही है, कारण मतदाता अपील का अनूठा तरीका । ए…हामरो’…की यह स्टीकर श्रृंखला भावनात्मक अपील के रूप में मतदाता को मतदान से जोड़ने के लिए सटीक है। इसकी चर्चा भी हर जगह हो रही है। वहीं निर्वाचन विभाग भी…

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वागड़ का काला बादल, दे रहा जमकर टक्कर…

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मनीष कलाल। काला बादल, नाम थोड़ा अटपटा जरूर है, लेकिन यही इसकी पहचान है। यह कोई जगह नहीं, कोई जानवर नहीं, यह चावल की एक किस्म है। जो सिर्फ अपने नाम के कारण पहचानी जाती है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से 68 किमी की दूरी तय करने जसैला, गरियता व चीखली क्षेत्र के गांवों में हर कोई इस नाम से परिचित है। इस चावल के सामने कोई भी चावल टिक नहीं पाता है। एक—एक दाना ऐसा खिलता है कि स्वादिष्ता में अच्छे से अच्छा चावल फीका पड़ जाए। चावल की अन्य…

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विश्वास एवं साख से बनी थी घी वाले ओटले की पहचान…

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सागवाड़ा डूंगरपुर जिले का एक शहर। जिसकी पहचान फिलहाल सोने—चांदी के व्यापार से हैं। यहां लोग दूर—दूर से सोने की खरीदी के लिए आते है। आज भी वागड़ में सोने की खरीदी के लिए अधिकतर लोग सागवाड़ा शहर को ही पंसद करते हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब इसकी पहचान घी की शुद्धता की वजह से थी। यहां रोज घी की मंडी सजती थी। कणीदार रबड़ी जैसा घी गांवों से मटकों में आता था। किसान व पशुपालक माथे पर मटकों को रखकर पैदल ही चल पड़ते थे। कहते…

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वागड़ की शख्सियत नाथूसिंह राठौड़, जिन्हें इंडियन आर्मी करती है याद..

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अकबर के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले जयमल राठौड़ के वंशज वागड़ के लेफ्टिनेंट जनरल नाथूसिंह राठौड़ एक ऐसी शख्सियत थी जो अपने कार्य के प्रति कभी लापरवाह नहीं रहे। इनकी ईमानदारी व देशभक्ति ऐसी थी कि कई लोग इन्हें आज भी अपना आदर्श मानते हैं। इनका उत्साह व मेहनत देखकर हर कोई अचरज में पड़ जाता था। चाहे कितना बड़ा अधिकारी क्यों न हो, वह अपनी बात कहने में कभी हिचकिचाते नहीं थे। लोग बताते हैं कि साहस व स्वाभिमान इनका आभूषण था। इनका जन्म रियासतकाल में डूंगरपुर के गुमानपुरा…

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डूंगरपुर का चपड़ा, इसकी स्वादिष्टता ही पीढ़ियों से पहचान

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डूंगरपुर से कार्तिक शर्मा की नजर से : डूंगरपुर रियासत कालीन शहर है, इस शहर में कई खुबियां है। इसी शहर में माणक चौक के पास एक दुकान है, जिसकी पहचान लि​मड़े वाली दुकान से है। लिमड़े मतलब कभी यहां दुकान के पास नीम का पेड़ हुआ करता था। दिखने में सामान्य है, पर इस दुकान की पीढ़ियों से पहचान बनी हुई है। अब इसको इस​लिए खास तौर पर याद किया जाता है, क्योंकि वर्षभर में सिर्फ नौ दिन यहां चपड़ा तैयार किया जाता है। नाम थोड़ा अटपटा जरूर है लेकिन…

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नहीं देखा होगा ऐसा प्रेम, खरीदी पक्षियों के लिए जमीन…

डूंगरपुर। पुराने जमाने में दिन की शुरूआत पक्षियों को दाना पानी देने से होती थी। यह दान पुण्य का हिस्सा माना जाता है। पक्षियों को दाना पानी देना हमारे ग्रह दोष व स्वास्थ्य से जोड़ कर देखा जाता है। संतान प्राप्ति, धन वृद्धि के लिए पक्षियों को दाना डाला जाता है। आज भी जब हमने अपने घर की छत पर रंग बिरंगी पक्षी देख लेते है तो मन को अजीब सी खुशी मिलती है। डूंगरपुर जिले के पीठ कस्बे के प्राचीन परवडी चौक की कहानी भी अपनत्व व परिंदों के…

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जब मुहम्मद गजनवी ने किया आक्रमण, तो बना वागड़ का यह मंंदिर

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डूंगरपुर। वागड़ के शिवालयों की कलात्मकता इतनी अद्भूत है कि देख कर ही अचरज में पड़ जाते है। आखिर इस ​मंदिर को बनाया कैसे होगा। डूंगरपुर का देवसोमनाथ शिवालय भी कुछ ऐसा ही है। कहा जाता है कि जब मोहम्मद गजनवी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय सोमपुरा शिल्पकार वहां से विस्थापित होकर गुजरात व राजपुताना के वागड़, मेवाड़ व मारवाड़ में आकर बस गए। वागड़ व मेवाड़ में बसे सोमपुरा शिल्पकारों ने सोमनदी के तट पर अपने आराध्य सोमनाथ महादेव का भव्य शिवालय बनाया। इस…

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आशापुरा माताजी ने चुनी वागड़ की धरा, ऐसे पहुंची यहां प्रतिमा

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महिपालसिंह, डूंगरपुर। वागड़ के प्रसिद्ध शक्ति पीठ निठाउवा गामडी स्थित आशापुरा माताजी मंदिर से भक्तों की अनूठी आस्था है। इस प्रतिमा के दर्शन के लिए देशभर से श्रद्धालु आते हैं। आज हम आपको वागड़ दर्शन के जरिये आप सभी को आशापुरा माताजी मंदिर के बारे में कुछ रोचक बातें बताने जा रहे है, जो इससे पहले आपको शायद ही पता होगी। यह प्रतिमा देशभर में इस लिए विख्यात हैं क्योंकि यह तारागढ़, दिल्ली, मारवाड़, मंदसौर, सांडलपोर होते हुए वागड़ पहुंची। प्रतिमा स्थापना के लिए वागड़ की धरती चुनी गई। चौहान वंश…

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