अच्छा, ऐसे मिला चौरासी विधानसभा क्षेत्र को अपना नाम…

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डूंगरपुर। चौरासी विधानसभा को लेकर प्रश्न उठता है कि आखिर इसे चौरासी क्यों कहा जाता है, इसे पिचयासी या छियासी क्यों नहीं कहते हैं। सरकारें चाहती तो इसे एकयासी या बयासी भी कह सकते हैं, लेकिन नामकरण चौरासी विधानसभा क्षेत्र के रूप में हुआ। इसके नामकरण को लेकर कई लोगों से बातचीत की, तो किसी के पास कोई जवाब नहीं था। कोई कहता है, बस नाम पड़ गया। कोई कहता है कि बस ऐसे ही कहते हैं। लेकिन जिज्ञासा थी कि इसके पीछे की बात जाननी थी। क्योंकि डूंगरपुर, बिछीवाड़ा व सागवाड़ा विधानसभा के बारे में सब जानते हैं, लगातार प्रयास करने के बाद पता चला कि डूंगरपुर रियासत के समय से ही चौरासी की अपनी पहचान थी। वह दौर था, जब राजा—महाराजाओं का शासन था। रियासत के अधीन जागीर थी। वहां का शासक जागीरदार कहलाता है।

पीठ रावला के ठाकुर वीरेंद्रसिंह ने वागड़ दर्शन से बातचीत में बताया कि डूंगरपुर रियासत के समय पीठ जागीर हुआ करती थी। इस जागीर के अंतर्गत 84 गांव थे। उन 84 गांवों पर पीठ जागीर का नियंत्रण व निगरानी थी। यहां लोगों का आना जाना लगा रहता था। उसी के आधार पर चौरासी विधानसभा का नामकरण किया गया। जागीरदार संग्रामसिंह के समय से ही इसको जाना जाता था। उस समय बनकोड़ा के बाद जिले में पीठ की विशेष पहचान थी।

शिक्षाविद् 76 वर्षीय उत्सवलाल कोठारी कहते हैं कि पीठ जागीर के 84 गांव की सीमा अंबाडा व कोचरी तक थी। पीठ इन गांवों का केंद्र बिंदु था। सबसे पुराना होने के कारण व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। राजनीतिक गढ़ होने के कारण नेताओं की सर्वाधिक आवाजाही रहती थी। आज भी नेताओं का सर्वाधिक आना जाना लगा रहता है। पूर्व विधायक शंकरलाल अहारी कहते हैं कि उस समस क्षेत्र में 84 चौखले थे। जिसे गांव कहा जाता है। उन 84 गांवों के कारण चौरासी का नामकरण हुआ। पहली बार विधानसभा का चुनाव वर्ष 1952 में हुआ।

 

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