डर, उदासी, विरक्ति और चांद…

डायरी / कुमार अजय

रात के दस बजने को है। कांकाणी का वही ढाबा है, पंकज उधास की गजलें सुनकर लौटते हुए जहां कभी कढ़ी-सोगरे का स्वाद चखा था। कढी के साथ सेव-टमाटर, छौंकी हुई हरी मिर्च और दही डालकर चूरी हुई बाजरी की रोटी में जब ढाबे वाला लड़का देसी घी की ‘मिरकली’ डालता है तो दिल चाहकर भी मना नहीं कर पाता जबकि आम दिनों में तो घी लगभग वर्जित ही है। मोटापा, बीपी, डायबिटीज और जाने क्या-क्या डर। डर अपनी जगह झूठे भी नहीं। लेकिन कभी-कभी सारे डरों से आगे जीने को जी चाहता है। इस चाह के पीछे कभी कोई खुशी होती है तो कभी-कभी कोई उदासी भी सारे डरों से डरावनी होकर कहती है कि कर ले बेटा, अब काहे का डर है। यूं भी सारे तमाशे तय हैं। कई बार समझना मुश्किल होता है कि क्यों किसी क्षण किसी का बर्ताव ऐसे अजीब सा हो जाता है कि हम सोच भी नहीं पाते कि क्या यह वही व्यक्ति है। अक्सर लगता है कि आदमी का दिमाग भी एक कम्प्यूटर की तरह ही है, जिसके साॅफ्टवेयर का कोई भी भरोसा नहीं कि कब हैंग हो जाए और कब अजीबोगरीब-सा बर्ताव करने लगे। कई बार जिंदगी मनुहार कर हमें बुलाती है और यूं बेइज्जत कर देती है कि खड़े होकर चलना भी दूभर हो जाता है तो कभी वही इतना प्यार लुटाती है कि खड़े होकर चलने का मन ही नहीं करता। लेकिन क्षण अच्छे हों कि बुरे, गुजर जाते हैं। अपना रंग छोड़ जाते हैं। वक्त ये रंग आदमी को दिखाते रहता है। आदमी कहता है कि वक्त रंग बदल रहा है। वक्त हैरान है कि आदमी की गति इस मामले में उससे बहुत तेज है।

खैर, वक्त बदलता है तो पैमाने भी बदल जाते हैं। आज फिर अकेले बैठकर फिल्म देखी, ‘बधाई हो’। फिल्म का काॅन्सेप्ट यूं नया है कि दादा-दादी बनने की उम्र में एक दंपत्ति के मां-बाप बनने का संयोग बनता है और सारे घरवाले एक बार तो खूब लज्जित होते हैं और करते भी हैं। ‘हम दो हमारे एक’ और एकल परिवार के इस समय में नई पीढ़ी और इस पीढ़ी के फिल्मकार के लिए यह नया और फिल्म मेकिंग का विषय भले ही हो, लेकिन अगर किसी 70-80 साल के बुजुर्ग से ही इस विषय पर बात करें तो साफ नजर आएगा कि उनके जमाने में यह बहुत सामान्य बात थी। आज से चालीस-पचास साल पहले तो चाचा और बुआओं की उम्र भतीजों से कम रही है और गवाह के तौर पर यह पीढ़ी भी हमारे बीच में मौजूद ही है अभी। आपके और हमारे, सबके परिवारों में यह आम बात रही है लेकिन ़सच यह भी है कि वर्तमान पीढ़ी का जुड़ाव अपनी जड़ों से इतना कमजोर है कि वह इस विषय को किसी नए और अचरज की तरह स्वीकार कर रहा है। फिल्म बाॅक्स आॅफिस पर सफल भी हो रही है। मेरे दो सौ बीस रुपए को मिलाकर फिल्म करोड़ों का व्यवसाय कर चुकी है। अच्छा यह है कि उदासी और जीवन की जड़ता को तोड़ने के लिए किसी व्यवसाय की तरह ही सही, कम से कम कोई काम तो हो रहा है। बाकी आदमी की उदासियां टूटने का नाम ही कहां लेती हैं। कई बार मोहभंग सा होता है। वाट्सएप्प पर एक दोस्त का मैसेज है। वह कहता है कि व्यवस्था बर्बाद हो रही है। मेरा जवाब है कि हो जाने दो। पहले बर्बाद होगी, फिर आबाद होगी। इस सफर में हम जैसों के सफर चलते रहेंगे। यह एक वैराग्य की सी स्थिति है। जैसे किसी धर्मशाला में हैं, कहीं दूसरी जगह अपना घर है और बस चले जाने को जी चाहता है। दोस्त कहता है कि उसकी भी हालत यही है। मैं कहता हूं कि बीमारी नहीं, इलाज बताओ। वह कहता है कि इलाज चाहिए किसे। बीमारी में ही सबको मजा आ रहा है। दोस्त की बात सही लगती है। लगता है कि जब कभी बीमारी कुछ कम होती है, तब यह विरक्ति पैदा होती है। बीमारी परवान पर रहे तो सब आराम से चलता रहे। बीमारी की बात चली तो याद आया, एक उपन्यास में पढ़ा था कि उसका मुख्य पात्र बीमारी को बढने देता है ताकि उसके लक्षण बहुत ठीक से उभर सकें और बाद में अच्छी तरह उसका उपचार किया जा सके। यह आत्महत्या जैसा ही काम था और अंत में पात्र मृत्यु का शिकार होता ही है। यूं भी प्रेम त्रिकोण से भरी कहानी में उसका मर जाना ही ठीक था शायद। कुछ पात्र इस दुनिया में दुर्भााग्यपूर्ण ढंग से जीते हैं और सदैव अपने लिए और दूसरे के लिए दुख का ही कारण बनते रहते हैं या ऐसे समझे जाते हैं। दुनियादारी से भरी इस दुनिया में अक्सर प्रेम के लिए ही जगह नहीं दिखती तो त्रिकोण के लिए तो ठीक से गुंजाइश ही कहां होगी। खैर, वाट्सएप्प पर आए दोस्त नीत्शे के हवाले से कहते हैं कि दुनिया में एक ही आश्चर्य है कि आदमी आत्महत्या क्यों नहीं कर लेता। मुझे याद है, इन्हीं दोस्त ने पंद्रह साल मुझे कहा था कि आत्महत्या कायरता नहीं है, हर किसी के बस का खेल भी नहीं है। यह बात और है कि यह कोई महिमामंडन की चीज नहीं है। महिमामंडन तो जिंदगी और जिंदादिली का ही होना चाहिए। हालांकि मरने के लिए भी बड़ी जिंदादिली की जरूरत होती है। जो लोग किसी उद्देश्य के लिए मर जाते हैं, उनकी जिंदादिली के किस्से हम सुनाते भी हैं। खैर, दोस्त ने तब नीत्शे को नहीं पढ़ा था और वाट्सएप्प आदि भी न थे। बीकानेर के तीर्थम सर्किल की दूब में बैठकर और फिर वहीं पास की चाय की दुकानों में बैठकर घंटों गप्पें होती थीं। वह भी क्या समय था, जब हम बैठकर उससे भी पुराने दिनों के लिए कहते थे कि वह भी क्या समय था।

खैर, मैंने भी एक नाटक में कहीं यह पढ़ा था कि उसका आत्महत्या कर रहा पात्र दूसरों से यह पूछता है कि वे सब आत्महत्या क्यों नहीं कर रहे। यह भी कमाल ही है कि पूरी दुनिया ही एक नाटक है जबकि हम किसी किताब या रचना विशेष को नाटक कहते हैं। इसी विरक्ति से गुजर चुके एक दूसरे दोस्त का मानना है कि सुख परछाई की तरह है, जब हम उसे पकड़ना चाहते हैं तो वह हाथ नहीं आएगा लेकिन हम अपने हिसाब से चलेंगे तो वह हमारे पीछे-पीछे, आसपास ही मंडराता रहेगा, हमें छोड़कर कहीं नहीं जाएगा। लेकिन हमारी भी प्रवृत्ति ऐसी है कि हम चीजों को बस पकड़ लेना चाहते हैं, गुलों को बस मसल देना चाहते हैं, रोज सोने का एक अंडा भी हमारा मन नहीं भर पाता, हम मुर्गियों को काट लेना चाहने वाले लोग हैं। हम जिसे चाहते हैं, उसके जीने के अपने ढंग से हमें शिकायत है। हमें जो चाहता है, वह हमारे तौर-तरीकों से खुश नहीं है। हम जैसे हैं, कभी हमने एक-दूसरे को इसी रूप में पसंद किया था और एक-दूसरे को बदल देना चाहते हैं। यहीं से हमारे दुखों की शुरुआत हो जाती है।

खैर, मन नहीं भरता लेकिन इतने स्वाद के बावजूद दो से ज्यादा बाजरे की रोटी खा लेना संभव नहीं लगता। सफर भी तो करना है अभी। आसमां में चांद मुस्करा रहा है। कल करवा चैथ थी। उसकी पूछ चरम पर थी, आज जैसे जुगाली कर रहा है। जुगाली बुरे दिनों की हो तो भी दिन ठीकठाक गुजर जाते हैं। अच्छे दिनों की जुगाली में बहुत बेहतर गुजर हो सकती है। अमावस तो आनी है, बस उसके डर से चांद जितने दिन बचा रहे, अच्छा है। जिंदगी में यदि एक भी खूबसूरत पल हमारे पास रहा हो, जिसमें किसी ने बड़ी शिद्दत से हमें चाहा हो, टूटकर पे्रेम किया हो, देह को नहीं किसी की आत्मा को हमने छुआ हो तो उस क्षण के सहारे पूरी जिंदगी बहुत आसानी से गुजारी जा सकती है। और जिन्हें यह एक भी पल नसीब नहीं हुआ, उनके लिए तो बस अगले जन्म की दुआ ही की जा सकती है। आत्मा तो यूं भी जन्म-जन्मांतर से आगे की चीज है। पुनर्जन्म होता है या नहीं, ठीक से नहीं कह सकते लेकिन इस बहाने प्रेम में असफल जोड़े जरूर एक आश्वस्ति पा लेते हैं कि इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में जरूर मिलेंगे। करवा चैथ पर सात जन्मों की बुकिंग का नवीनीकरण खूब हुआ है। यूं कई ज्ञात-अज्ञात बुकिंग भी अगले जन्मों के लिए हमारी हो ही चुकी होगी, यह आत्ममुग्धता भी भरपूर मन मोह लेने वाली है।
कार दौड़ रही है, पाली पास आ रहा है।

कुमार अजय, घांघू, चूरू

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