यहां पशु भी मनाते हैं दिवाली, होती है दौड़

राजेश पटेल, डूंगरपुर। त्योहारों पर राजस्थान जैसी परंपराएं आपको कहीं पर भी देखने को नहीं मिलेगी। यहां दीपावली पर्व पर पशु भी त्योहारों का हिस्सा बनते हैं। वागड़ के गांव—गांव में पशु दौड़ की परंपरा बरसों से चली आ रहा है। गायों को कच्चों रास्तों व मुख्य मार्ग पर दौड़ाया जाता है। दौड़ में जो पशु सबसे आगे निकलता है, उसके आधार पर वर्ष के सुखमय रहने की भविष्यवाणी की जाती है।

छापी गांव के रामेश्वर पाटीदार ने बताया कि जिस रंग की गाय आगे निकलती है उससे नया वर्ष कैसा रहेगा इसकी भविष्यवाणी की जाती है। बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। सफेद और हरे रंग की गाय से साल अच्छा रहेगा। कई रंगों वाली गाय से वर्ष मध्यम व काले रंग की गाय से अकाल व सुखा पड़ने की भविष्यवाणी की जाती है। इसी से किसानों को अपनी पैदावार का पता चलता है। इस दौरान ग्रामीण लोक गीत गाकर माहौल उत्सवी बना देते हैं।

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श्रृंगार कर लाया जाता है निर्धारित स्थान
वागड़ के गांव—गांव मेें दीपावली की शाम व नववर्ष यानि गोवर्धन पूजा के दिन पशु दौड़ का आयोजन होता है। पंचाग के अनुसार शुभ मुहूर्त पर गायों और बैलो को फूलमाला, विविध रंगों के साथ पशुपालक व किसान श्रृंगार ​करता है। पशुओं को नहलाते—धुलाते हैं। परंपरागत रमजी रंग पशुओं के सिंग-व शरीर का सौन्दर्य करते हैं। पूजा करने के करने बाद निर्धारित स्थल पर लेकर आता है। पशुओं को दौड़ाने के लिए पटाखे छोड़े जाते हैं। पशु दौड़ के एक तरफ किसान व पशुपालक भी पशुधन को संभालने के लिए भागते नजर आते हैं।  गाय—बैल का मुंह मीठा भी कराया जाता है। 

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मेले सा रहता है माहौल
यहां होली व दीपावली पर्व का अलग ही उत्साह व आनंद नजर आता है। गांवों में पहुंचने पर संस्कृ​ति की अलग ही झलक देखने को मिलती है। डूंगरपुर जिले के सागवाड़ा, आसपुर क्षेत्र, पीठ—सीमलवाड़ा क्षेत्र, बिछीवाड़ा क्षेत्र के छापी, माडा और नवलश्याम, चिखली क्षेत्र में पशु दौड़ का आयोजन होता है। छापी गांव के केदारेश्वर महादेव मंदिर के आगे, माडा के खेल मैदान और नवलश्याम स्थित चामुंडा माता मंदिर के आगे दौड़ होती है।

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