आवी गया पामणा, दिवारी आणू हे…

दिवाली आणा की अनूठी परपंरा सिर्फ वागड़ के डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिले में देखने को मिलती है। नवदंपत्ति की पारिवारिक जीवन की शुरुआत इस दिन से होती है। यह खास परंपरा नव दम्पति के लिए ही है। इस साल शादी करने वाले पुरुष ससुराल अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ पत्नी को लेने जाता है। यहां सभी का स्वागत व मान मनुहार किया जाता है। मिठाई बांटी जाती है। हंसी—ठिठोली होती है। पटाखे छोड़कर खुशियां मनाई जाती है। उस दौरान दुल्हे को भेंट स्वरूप आभूषण व वस्त्र दिए जाते हैं। शाम को दुल्हन को विदा किया जाता है। दुल्हन को ससुराल लाने की परपंरा ही दिवाली आणा कहलाती है।

दुल्हन के ससुराल पहुंचने के बाद गोवर्धन पूजा के दिन कार्तिक सुदी एकम को मेरियू की रस्म की जाती है। पंचमुखी व एक मुखी मिट्टी के मेरियू लिए जाते हैं। नवविवाहित जोड़े को अपने घर पर मेरियू में तेल पुरवाना होता है। इसमें पुरूष हाथ में मेरियू पकड़ कर घर की चौखट पर खड़ा रहता है। घर की महिलाएं तेल लेकर आती है। दुल्हन से मेरियू में तेल पुराया जाता है। इस दौरान दुल्हा व दुल्हन पक्ष के सदस्य व रिश्तेदार मौजूद रहते हैं। इस दौरान हंसी ठिठोली की जाती है। इस दौरान आस—पड़ोस के लोग भी शामिल होते हैं।

इसलिए पुरवाया जाता है मेरियू में तेल
वागड़ दर्शन के राजेश पटेल ने जब बुजुर्गो से बातचीत की बताया कि मेरियू की रस्म परंपरागत व बरसों से चली आ रही है। यह इसलिए किया जाता है ताकि नवदंपत्ति का जीवन दीपक की तरह हर समय उज्जवलित रहे। सुख—शांति रहे, किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आए। हर विपरीत परिस्थिति का सामना कर सकें। दुल्हन के द्वारा दीपक में तेल पुरवने का अर्थ यह है कि वह एक दूसरे के साथ रहे। पुरक बने रहे।

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बनाई जाती थी पापड़ी
दिवाली आणा व मेरियू रस्म वागड़ को अन्य ​हिस्सो से अलग करती है। समय के साथ त्योहारों में बदलाव हुआ है, लेकिन यह ​​विशिष्ट परपंरा अभी भी बरकरार है। कुछ समय पहले तक पहले दिन दूल्हे के घर देशी घी से पापड़ी बनाई जाती थी। ससुराल जाते वक्त पामणो को खिलाई जाती है। हालांकि अभी कई घरों में यह परपंरा नजर आ रही है।

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