जब मुहम्मद गजनवी ने किया आक्रमण, तो बना वागड़ का यह मंंदिर

wagad darshan

डूंगरपुर। वागड़ के शिवालयों की कलात्मकता इतनी अद्भूत है कि देख कर ही अचरज में पड़ जाते है। आखिर इस ​मंदिर को बनाया कैसे होगा। डूंगरपुर का देवसोमनाथ शिवालय भी कुछ ऐसा ही है। कहा जाता है कि जब मोहम्मद गजनवी ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया। उस समय सोमपुरा शिल्पकार वहां से विस्थापित होकर गुजरात व राजपुताना के वागड़, मेवाड़ व मारवाड़ में आकर बस गए। वागड़ व मेवाड़ में बसे सोमपुरा शिल्पकारों ने सोमनदी के तट पर अपने आराध्य सोमनाथ महादेव का भव्य शिवालय बनाया।

इस भव्य शिवालय की सबसे रोचक विशेषता यह है कि इसके निर्माण में किसी भी प्रकार की योजक सामग्री यानि की रेत, चुना, सीमेंट, मिट्टी आदि का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके बाद भी 150 से अधिक​ पाषाण खंभों पर मंदिर टिका है। शिल्पकार की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि पत्थरों का आपस में हाशिये व हाल से जोड़कर भव्य रूप दिया है। यहां आने वाले श्रद्धालु मंदिर को टकटकी लगाकर देखते रह जाते है। यह शिवालय स्थापत्य कला की दृष्टि से न केवल भारत अपितु विश्व मे भी बेजोड़ माना जाता है। वागड़ का देवसोमनाथ शिवालय गुजरात के सोमनाथ महादेव की प्रतिकृति माना जाता है। पुरातत्व विभाग ने इसे राष्टीय संपदा घोषित किया है। मंदिर के मूल स्वरूप में किसी भी प्रकार की योजक सामग्री का प्रयोग नहीं किया गया है

शिवालय में पाषाण खंभे, तोरण

 

एक हजार वर्ष पुराना मंदिर

मंदिर करीब एक हजार वर्ष पुराना है। मंदिर में स्थापित एक शिलालेख के हिसाब से इसकी अवधि 12 शताब्दी मानी जाती है। यह श्वेत पाषाणों से निर्मित मंदिर है। पुरातत्व विभाग के अधिनस्थ यह मंदिर राज्य के मेवाड़ व वागड़ धरा को अलग करने वाली सोमनदी के तट पर स्थित है, जो कि बारह ज्योतिर्लिंगो में सम्मिलित सोमनाथ मंदिर की बनावट लिए हुए है। यह मंदिर तीन मंजिला है। शिवरात्रि पर देवसोमनाथ शिवालय में विशाल मेला लगता है।

नंदी के कानों में बोलते हैं मुराद, होती है पूरी
मंदिर के सभा मंडप पर नंदी की विशाल प्रतिमा देखने को मिलेगी। नंदी की यह प्रतिमा इच्छा पूर्ति नंदी के रूप में जानी जाती है। श्रद्धालु अपने मन की मुराद नंदी के कान में व्यक्त करते है। आस्था है कि नंदी श्रद्धालुओं की मनोकामना अवश्य पूरी करते हैं। यहां आए दिन श्रद्धालुओं की खासी भीड़ देखने को मिलती है।

जलमग्न हो गया था शिवालय
डूंगरपुर राज्य का इतिहास नामक पुस्तक में उल्लेख है कि ईसवी संवत 1875 (विक्रम संवत 1932) में सोमनदी की जलधारा ने शिवालय की अंतिम व तीसरी मंजिल की इमारत को जलमग्न कर दिया था। मंदिर के शिखर के भीतर पहुंचने पर एक दृश्य नजर आता है। उनमें थोड़े थोड़े अंतर पर वृत्ताकार पाषाण खड़े व उन्ही पर आडी पट्टिया भी मौजूद है जो कि अपने आप मे अद्भुत रचना लिए हुए है। शिवालय में भोलेबाबा के दर्शन सभामंडप से आठ पाषाण सीढ़ियों के उतरने पर हो पाते है।

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गोखड़े व तोरण करते हैं आकर्षित
इस शिवालय के चारों ओर प्राकार (कोट) है। शिवालय में पूर्व उत्तर व दक्षिण दिशा में कुल तीन द्वार है। प्रत्येक द्वार पर दो-दो मंजिला नयनाभिराम झरोखों का निर्माण नजर आता है। गर्भगृह के सामने कुल आठ विशाल पाषाण स्तम्भो से निर्मित सभा मण्डप भी है। भव्य देवालय में गवाक्ष (गोखड़े), पाषाणों पर नर्तकियों की मनमोहक प्रतिमाएं, मेहराब, तोरण भक्तो को अपनी तरफ आकर्षित करते है। निज मंदिर में मध्य कृष्ण पाषाण का श्वेत पाषाण की जलधारी के मध्य शिवलिंग स्थित है। यहां विशाल कुंड व भगवान हनुमान की प्रतिमा भी स्थित है।

यहां पर स्थित है मंदिर
डूंगरपुर शहर मुख्यालय से उत्तर पूर्व में तकरीबन 25 किलोमीटर दूर देव गांव में सोम नदी के तट पर शिवालय स्थित है। इसलिए इसे देवसोमनाथ कहा जाता है। रियासत कालीन डूंगरपुर राज्य का सबसे प्राचीनतम व भव्य शिवालय है।

पाषाणों पर उकेरे है शिलालेख
देवसोमनाथ शिवालय में कई जगह पर पाषाणों पर शिलालेख उकेरे हुए है। मंदिर के बाहर एक स्तम्भ पर महारावल सहसमल के समयकाल में विक्रम संवत 1645 ईसवी संवत 1588 का शिलालेख भी वर्तमान तक लिखित है। मंदिर के छबनो पर यात्रियों के खुदवाए हुए लेख भी मौजूद है। कुछ अक्षर छोटे तथा कुछ के घिस जाने से उनका आशय स्पष्ट रूप से प्रतीत नही हो पाता। शिवालय के शिलालेखों में सबसे प्राचीन शिलालेख विक्रम संवत 1530 व ईसवी संवत 1473 का अंकित है।

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