जाने क्या है थाणा की रामणा रस्म…

वागड़ अंचल में दीपावली पर्व पर कई परंपरा व रीति​ रिवाज है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से पांच किमी की दूरी पर स्थित है थाणा गांव। कभी इस गांव को शाला शाह थाणा कहा जाता था। इस गांव में दीपावली पर्व अनूठे तरीके से मनाया जाता है। यहां गन्ने और पताशे बांटकर दिवाली मनाई जाती है। जिसे स्थानीय बोली में रामणा कहते हैं। बताते हैं कि गांव के चौराहे पर सभी जाति धर्म के लोग एकत्रित होते हैं। किसान अपनी अपनी इच्छानुसार गन्ने की भारियो को रखते हैं। यहां गन्ने के टुकड़े कर ग्रामीणों को बांटे जाते हैं। इसके बाद किसी ग्रामवासी की इच्छा पर उसके घर पर सभी लोगो को आमंत्रित किया जाता है। जहां पताशे और नारियल बांटे जाते है। लोगों ने बताया कि गन्ना व पताशों में मीठापन होता है। रिश्तों में मिठास लाने के लिए सेलिब्रेट करने का पंरपरागत तरीका है। जहां सभी को गांव के चौराहे पर एक साथ शरीक होने का मौका मिलता है।

बुजुर्गो का कहना है कि गांव में सामाजिक समरसता बनी रहे व नई फसल पैदावार अच्छी रहे, इस​के लिए परंपरागत रूप से रस्म की जा रही है। मौके पर ही बुजुर्गों के द्वारा हेड़ा गीत(पूरे वर्ष की कहानी) गाते हुए शुभकामनाएं दी जाती है। हेड़ा गीत एक प्रकार का परंपराओं पर आधारित कहानी गीत है।

गांव के लक्ष्मण पटेल बताते हैं कि एक समय गांव में गन्ने की पैदावार अधिक होती थी। इसलिए यह दिवाली पर मीठी मनुहार है, लेकिन समय के साथ गन्ने की पैदावार में कमी आई है। अब सिर्फ बहुत कम लोग ही गन्ने की खेती करते हैं। लेकिन बरसों से चली आ रही परंपराओं को जीवंत कर संस्कृति का निवर्हन किया है। रामणा मात्र थाणा गांव में ही किया जाता है। गन्ने की भारियों को लाकर रखने की परपंरा अन्य किसी भी जगह पर सुनने को नहीं मिली है।

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