यहां छलका दूध का कुंभ, ओर बन गया सामौर सेठ का मंदिर

kheda samor

वागड़ में यहां भगवान विष्णु कहलाते हैं सामौर सेठ…

महिपालसिंह, डूंगरपुर। वागड़ में हर गांव का धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व है। हर गांव में आपको मंदिर मिल जाएंगे, हर मंदिर के पीछे किवंदती मिलती है। तभी वागड़ धर्म की नगरी कहलाती है। इसी वागड़ के डूंगरपुर जिले में एक गांव ऐसा भी हैं जहां भगवान विष्णु की प्रतिमा सामौर सेठ कहलाती हैं। गांव भी सामौर नगरी के नाम से विख्यात है। यह जगह आसपुर पंचायत समिति का खेडासामौर गांव है।

किवंदती है कि करीब 700 वर्ष पूर्व इस गांव में गुर्जर जाति निवास करती थी। इनका मुख्य व्यवसाय पशुपालन था। गांव के मुखिया का नाम सामौर गुर्जर था। जिसकी गाय जंगल में चरने जाया करती थी। इसमें सालेर नाम की एक गाय वापस घर आकर दूध नहीं देती थी। इस पर उस गाय की पिटाई कर दी। उस रात को मुखिया को सपना आया कि उसे मधुर वाणी मेंं कहा कि आज के बाद इस गाय को मत पीटना। इसका गोपालक मैं हूं। यह गाय प्रतिदिन मुझे दूध पिलाती है। सुबह उठकर आक व धतूरे की गाडी बनाना। पास में स्थित पर्वत की छत पर श्वेत मूर्ति जमीन के अंदर है। इसे बाहर निकालना। पांच पंचों की मदद से रथ पर रखकर प्रात:काल में जन्मे हुए दो बछडो को रथ के आगे करना।

एक कुंवारी कन्या को दूध का कुंभ भरके रथ के आगे करना। जहां कुंभ में से दूध छलके और रथ टूटे उसी पावन धरा पर प्रतिमा स्थापित कर मंदिर बनाना। मेरा नामकरण सामोर सेठ करना। कहते हैं कि स्वप्न में मिले आदेश का पालन किया गया।

 

सागवान के पेड़ से निकली दूध की धारा
कुछ वर्ष बीतने के बाद सामौर गुर्जर को आकाशवाणी में आदेश मिला कि मेरी मूर्ति पर दूध का अभिषेक करना जिसकी धारा महाकाल की नगरी क्षिप्रा के तट पर उज्जैन में निश्चित जगह पर एक सागवान के वृक्ष की जड़ से निकलेगी। जहां पर जाकर आप सब बस जाना। इसके बाद गुर्जर समुदाय उज्जैन जाकर बस गया। वहां से प्राप्त दूध से ही भगवान विष्णु का अभिषेक किया गया।

गुर्जर बना गए थे मंदिर का गर्भगृह
खेरमाल नामक गांव के पास भावापुरी नामक शहर था। जो मावजी महाराज का ननिहाल था। वहां से पांच रक्षकों के साथ पुजारी घना जंगल व जंगली जानवरों के भय से सप्ताह में एक बार पूजा करने सामौरा मंदिर पहुंचते थे। कुछ वर्षो बाद प्राकृतिक आपदा से भावापुरी का पतन होने लगा। कुछ परिवार वर्तमान में स्थित खेडासामौर गांव में बस गए। इसमें पाटीदार समाज का बाहुल्य है। मंदिर का गर्भगृह गुर्जर बना गए थे। चौकी, गुम्बद, परकोटा, मय कमरा मुख्य दरवाजा गांव के पाटीदार समाज ने करीब 11 लाख रूपयों की लागत से बनवाया।

कहते हैं सामौर सेठ का मेला
पाटीदार भाईयों की एक बहन ने मंदिर के कार्य में सहयोग किया। उसकी शादी लोकिया बनकोडा गांव में हुई। तब बहन ने भाईयों से मंदिर में मेरा क्या हक रहेगा, सवाल किया। तब भाईयों ने प्रभु को साक्षी मानकर वचन दिया कि प्रत्येक नवरात्री के प्रथम रविवार को यहां मेला भरेगा। जिसमें प्रथम ध्वजा तेरी चढ़ेगी। इसका निवर्हन वर्तमान में हो रहा है। ओर खेडासामौर गांव सामौर नगरी के नाम से विख्यात है।

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