नी मल्यो हेड़ों, इतना लंबा है वागड़ का हेड़ा गीत

राजेश पटेल, डूंगरपुर। ‘हेड़ा’ गीत नाम थोड़ा अजीब जरूर है, लेकिन नामकरण के पीछे भी एक तथ्य है। वागड़ में कहते हैं कि हेड़ों नी मल्यो। मतलब जिसका अंतिम छोर नहीं मिलता है। यह गीत ऐसा है कि शुरू होने के बाद इसका अंत नहीं होता है। यह गीत इतना लंबा है कि दो से तीन दिन लगातार गाने के बाद भी खत्म नहीं होता है। इसे वागड़ी बोली में ही गाया जाता है।

जनजाति बहुल डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में कई बुजुर्ग इसे गाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के लोगों को यह गाना नहीं आता है, लेकिन सीखने का काम जरूर कर रहे हैं। पाटीदार व आदिवासी समाज के लोग विशेष रूप से त्योहार पर गाते हैं। बताते हैं कि यह गीत अकेले नहीं गाया जा सकता है, इसके लिए अन्य साथियों का साथ होना जरूरी होता है।

 

इस हेड़ा का नहीं मिलता हेड़ा
वागड़ दर्शन टीम के कहने पर जीवन लाल, देवजी, कोदर पाटीदार और हथोड़ गांव के नानजी, लालजी, हकसी आदि ने आवाज दी है। बुजुर्गो ने बताया कि वागड़ी में इस हेड़ा को कभी हेड़ा नहीं मिलता है। गांव के बुजुर्ग युवाओं को इस गीत के बारे में बता रहे हैं। यह वागड़ी की संस्कृति का बरसों से चला आ रहा गीत है।

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इस गीत में किसानों की सारी परंपराओं का वर्णन होता है। इस गीत की ध्वनि समान होती है। इस गीत में गायी जाने वाली कहानी अलग अलग गांवो में अलग-अलग होती है। बुजुर्ग इस गीत को थोड़ा रूक-रूक गाते हैं। इसे खासकर दिवाली व खुशी के मौके पर ही गाया जाता है। बुजुर्गो ने बताया कि इस गीत में खेत से लेकर घर, पशु, समाज, पानी, प्रकृति, परिवार आदि का जिक्र आता है। अलग अलग गांवों में बोल भी बदल जाते हैं। इसे हंसी-खुशी के साथ गाया जाता है।

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