डूंगरपुर का चपड़ा, इसकी स्वादिष्टता ही पीढ़ियों से पहचान

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डूंगरपुर से कार्तिक शर्मा की नजर से :

डूंगरपुर रियासत कालीन शहर है, इस शहर में कई खुबियां है। इसी शहर में माणक चौक के पास एक दुकान है, जिसकी पहचान लि​मड़े वाली दुकान से है। लिमड़े मतलब कभी यहां दुकान के पास नीम का पेड़ हुआ करता था। दिखने में सामान्य है, पर इस दुकान की पीढ़ियों से पहचान बनी हुई है। अब इसको इस​लिए खास तौर पर याद किया जाता है, क्योंकि वर्षभर में सिर्फ नौ दिन यहां चपड़ा तैयार किया जाता है। नाम थोड़ा अटपटा जरूर है लेकिन चर्चित है। चपड़ा एक स्वादिष्ट मीठा पापड़ नुमा कड़क वस्तु है। इसे शक्कर व गोंद के साथ नींबू को मिलाकर बनाया जाता है। इसे चाशनी में जमा कर तैयार किया जाता है। वर्षभर में सिर्फ एक बार खाने का अवसर लोगों को मिलता है। त्योहार के ​दिनों में इसकी अ​धिक डिमांड रहती है। लोगों में उत्सुकता रहती है। मांग पर ही तैयार किया जाता है। इस बार करीब 50 किलो चपड़ा बनाया। अब भी लोगों की मांग आ रही है।

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लोगों के अनुसार शहर की एकमात्र दुकान है, जो चपड़ा तैयार करती है। करीब आठ दशक पूर्व से ही यह दुकान अपनी पहचान बनाए हुए है। दुकान संचालक सुनील सेठिया कहते हैं कि लोगों को यहां तक पहुंचना होता है तो कारूलालजी की दुकान या लिमड़े दुकान कहने पर यहां पहुंच जाते हैं। इनके पिता कारूलाल सेठिया व उनके पिता भी चपड़ा तैयार कर बिक्री करते थे। अब पिछले दो दशक से तैयार कर रहे है।

इसलिए मिलाया जाता है नींबू
45 वर्षीय सुनील सेठिया चपड़ा बनाने में माहिर है। यह कहते हैं कि चपड़ा तैयार करने में मुनाफा अधिक नहीं मिलता है। कई लोग इसका प्रसाद के रूप में मंदिरों में भोग लगाते हैं। कई परिवार घरों में स्वादिष्टता के चलते घर ले जाते है। यह बताते हैं कि शक्कर व गोंद के साथ नींबू इसलिए मिलाया जाता है ताकि कड़क बन सकें। गोंद के कारण इसका रंग केसरी हो जाता है। कई लोग पहले ही दिन बनाने के लिए कह देते है।

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चपड़ा जिसे चीनी, गोंद व नींबू से मिलकर बनाया जाता है।

दांतों में चिपकता है चपड़ा..
चपड़ा बनाने में गोंद का प्रयोग होने के कारण यह दांतों में चिपकता है। ​मीठा होने के कारण इसका मजा दुगुना हो जाता है। मध्यप्रदेश व यूपी के कई जिलों में इसे अलग अलग नामों से पुकारा जाता है। यह दांतों में चिपकने व पापड़ जैसा होने के कारण वागड़ में इसे चपड़ा नाम मिला। हालांकि एमपी व यूपी में इसका रंग भी बदलाव देखे जाने की बात लोगों की तरफ से की जाती है। हालांकि डूंगरपुर में त्योहारी व्यंजन व त्योहारी प्रसाद के रूप में पहचान लिए गए है। बुजुर्गो का कहना है कि दिवाली व नवरात्र में चपड़ा नजर आता है। शरद पुर्णिमा पर विशेष रूप से भोग चढ़ाया जाता है।

शुगर की बीमारी ने बढ़ाई दिक्कतें

सुनील सेठिया कहते हैं कि 50 वर्ष पूर्व तक एक से दो क्विटल बिकता था। अब शुगर जैसी बीमारियां लोगों के बीच आ गई है। इसमें मीठापन के लिए शक्कर का इस्तेमाल किया जाता है। अब लोगों को शुगर होने के कारण इसकी बिक्री कम जरूर हुई है, लेकिन डिमांड बरकरार है। जो लोग इसकी महत्ता समझते हैं, यह पहले आकर बनाने के लिए कह देते हैं।

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