चारपाई पर नाचते हैं यह घोड़े, चाल को मदमस्त व मनमोहक बनाने पूरा परिवार करता है देखभाल

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जिला मुख्यालय से छह किमी दूर थाणा गांव में काठियावाडी व मारवाड़ी नस्ल के घोड़े, तीन दशक से ढोली परिवार घोड़ों के जरिये कर रहा गुजारा , बादल, तूफान, राजा, शेर, धनराज, बिजली, शहरी तूफान है घोड़ों के नाम

डूंगरपुर। महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का नाम हर कोई जानता है। राजाओं के शासनकाल में घोड़ा शानो शौकत की पहचान था। युद्ध से लेकर शुरवीरता में घोड़ों का नाम लिया जाता है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से छह किमी की दूरी पर स्थित थाणा गांव में ढोली परिवार घोड़े के जरिये अपने परिवार का गुजारा कर रहा है। इनके घोड़े क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रहे हैं। यह घोड़े खाट (चारपाई) पर भी नाचते हैं। ऐसे में घोड़ों की चाल को मदमस्त व मनमोहन बनाने के लिए पूरा परिवार देखभाल करता है। परिवार के अनिल ने बताया कि लोगों की डिमांड पर शादी ब्याह के दौरान चारपाई साथ लेकर जाते हैं। यह घोड़े नाचते हुए चारपाई पर आ सकते हैं।

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थाणा गांव में अस्तबल में बांधे गए घोड़े।

इसके लिए पहले दुल्हे को घोड़े पर बिठा दिया जाता है। उसके बाद यह नाचते हुए चारपाई पर आ जाते हैं। इनको नाचते हुए देखना ही सहज आकर्षण होता है। इन घोड़ों को गुजरात से मंगवाया गया है। कुछ का नामकरण यहां पर किया है, व कुछ का पहले से था। पिता के द्वारा शादी ब्याह में घोड़े लेकर जाने का काम होता था। अब परिवार के अन्य सदस्यों ने संभाल लिया है। घोड़े की सार संभाल करना खर्चीला है। एक घोड़े के लिए वर्षभर में दो से चार क्विंटल चने की व्यवस्था करनी पड़ती है।

थाणा गांव में ढोली परिवार के घर के बाहर बादल घोड़ा।
थाणा गांव में ढोली परिवार के घर के बाहर बादल घोड़ा।

थाणा गांव में इन परिवारों के पास बादल से लेकर तूफान, शेर से लेकर शहरी तूफान, राजा से लेकर धनराज नाम के घोड़े इनके घर आंगन के अस्तबल में बंधे हुए है। परिवार के दशरथ बताते हैं कि इन घोड़ों का जैसा नाम है, वैसी ही इनकी पहचान है। बादल व तूफान कभी थकते नहीं है। सभी घोड़ों की अपनी खासियत है। इन घोड़ों में काठियावाड़ी, मारवाडी नस्ल के घोड़े शामिल है। राजा घोड़े को जहां से खरीदा था, वहां मालिक ने उसे राजा की तरह पाला था। परिवार के सदस्य ने बताया कि बिजली नाम की घोड़ी भी थी, लेकिन बीमारी के कारण मौत हो चुकी है।

अब शादी ब्याह में नाचते तक सीमित है घोड़े
गेहरीलाल कहते है कि वर्ष के चार माह सीजन रहता है। बिछीवाड़ा क्षेत्र व डूंगरपुर में घोड़े धार्मिक आयोजन व शादी ब्याह के दौरान भेजे जाते हैं। इसके अलावा पड़ोसी गुजरात राज्य से लोग बुकिंग कराने के लिए आते हैं। गेहरीलाल बताते हैं कि वर्ष में चार माह सीजन से वर्ष भर का गुजारा निकल जाता है। गेहरीलाल पिता मोहन, अनिल पिता नाथु, रामलाल पिता नाथु, कारू पिता नाथु, दशरथ पिता मोहन, विनोद पिता मोहन का परिवार घोड़ों की देखभाल कर रहे हैं।

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