वागड़ का काला बादल, दे रहा जमकर टक्कर…

wagad darshan

मनीष कलाल। काला बादल, नाम थोड़ा अटपटा जरूर है, लेकिन यही इसकी पहचान है। यह कोई जगह नहीं, कोई जानवर नहीं, यह चावल की एक किस्म है। जो सिर्फ अपने नाम के कारण पहचानी जाती है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से 68 किमी की दूरी तय करने जसैला, गरियता व चीखली क्षेत्र के गांवों में हर कोई इस नाम से परिचित है। इस चावल के सामने कोई भी चावल टिक नहीं पाता है। एक—एक दाना ऐसा खिलता है कि स्वादिष्ता में अच्छे से अच्छा चावल फीका पड़ जाए। चावल की अन्य किस्म भी सोचती होगी कि मैं भी शायद काला बादल बन पाता। बुजुर्ग बताते है कि वागड़ की सबसे पुराना दूसरी किस्म का चावल काला बादल है। इसकी पैदावार में काफी मेहनत है, पानी की अधिक जरूरत है। हालांकि बरसों से इसकी पहचान है।पहले काफी बड़ी संख्या में इसकी पैदावार होती थी। गृहिणियों की पहली पंसद काला बादल चावल है।

विदेश में पहुंचा वागड़ का काला बादल
वागड़ से खाड़ी देश कुवैत, इराक में कई लोग रहते है। चीखली क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में लोग रहते है। काला बादल उन लोगों तक पहुंच रहा है। पिछले दो वर्षो की हालात देखे तो मांग बढ़ी है। यहां तक अधिकारियों की पहली पसंद वागड़ का काला बादल है। ऐसे में वह स्थानीय व्यापारी व किसान से संपर्क कर व कॉल करके काला बादल किस्म को खरीद लेते हैं। यहां आने के दौरान ले जाते हैं। कई अधिकारी अपने तबादले के बाद भी इसका स्वाद नहीं भूल पाए है। एक बार काला बादल किस्म से पके चावल खाने के बाद उनकी जुबां पर स्वाद बना रहता है, यही इसकी खासियत है। अतिथियों का स्वागत व अगवानी भी इन गांवों में काला बादल से होती है। मेहमान के आने पर काला बादल चावल ही तैयार किया जाता है।

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व्यापारी खुद पहुंच जाता है खेत तक
किसान बताते हैं कि काला बादल की मांग इतनी अधिक है कि व्यापारी खुद खेतों में पहुंच कर खरीदने का निर्णय कर लेते हैं। चार माह में फसल तैयार होती है। सितंबर—अक्टूबर का माह इसके लिए उपयुक्त होता है। इसके लिए पानी अधिक चाहिए। इसलिए पहले लोग तालाब की पाली व पानी आसानी से उपलब्ध होने वाली जगह पर खेती करते थे। ताकि पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़े। अब किसानों ने वैकल्पिक व्यवस्था कर रखी है। किसानों को काला बादल की बिक्री के लिए परेशान नहीं होना पड़ता है। कई ग्राहक अधिक दाम देकर भी मात्र घर के उपयोग के लिए 10 से 15 किलो चावल ले जाते हैं।

ऐसे मिला नाम…
काला बादल के नामकरण को लेकर बुजुर्ग किसानों ने बताया कि करीब 120 वर्ष से अधि​क समय से काला बादल चावल की पैदावार की जा रही है। किसान बताते हैं कि जब आसमान में काले बादल दिखने लगते हैं तो तब इस खेती के लिए सही समय समझते हैं। किसानों ने इसका नाम काला बादल कर दिया।

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