वागड़ की शख्सियत नाथूसिंह राठौड़, जिन्हें इंडियन आर्मी करती है याद..

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अकबर के खिलाफ युद्ध लड़ने वाले जयमल राठौड़ के वंशज

वागड़ के लेफ्टिनेंट जनरल नाथूसिंह राठौड़ एक ऐसी शख्सियत थी जो अपने कार्य के प्रति कभी लापरवाह नहीं रहे। इनकी ईमानदारी व देशभक्ति ऐसी थी कि कई लोग इन्हें आज भी अपना आदर्श मानते हैं। इनका उत्साह व मेहनत देखकर हर कोई अचरज में पड़ जाता था। चाहे कितना बड़ा अधिकारी क्यों न हो, वह अपनी बात कहने में कभी हिचकिचाते नहीं थे। लोग बताते हैं कि साहस व स्वाभिमान इनका आभूषण था। इनका जन्म रियासतकाल में डूंगरपुर के गुमानपुरा गांव में हुआ था। लेकिन वागड़ के युवाओं को इनके बारे में जानकारी नहीं है, इसलिए वागड़ दर्शन के जरिये हम आपको बहुत रोचक बातें बताने जा रहे हैं। वागड़ में ऐसी ​शख्सियत का जन्म होना ही, यहां की धरा को पावन करता है। आज भी बुजुर्गो के बीच इनकी निडरता व साहस की चर्चा होती है।

परखी नाथूसिंहजी की निड़रता
नाथुसिंह का जन्म 10 मई 1902 को हुआ। यह जयमल राठौड़ के वंशज थे। जिन्होंने मेवाड़ की तरफ से अकबर के खिलाफ युद्ध किया। इनके पिता का नाम हम्मीरसिंह था, यह इनके एकमात्र पुत्र थे। लोगों के अनुसार एक बार डूंगरपुर महारावल विजयसिंह इनके गांव आए। सब लोगों ने हाथ जोड़ कर महारावल का अभिवादन व स्वागत किया, लेकिन नाथूसिंह ने राष्ट के प्रति स्वाभिमानी के चलते उन्होंने महारावल को सेल्यूट किया। नाथूसिंह नन्हे बालक थे। बताते हैं कि महारावल व नाथूसिंहजी के सवाल जवाब का दौर चला। नाथूसिंह ने बेबाकी व निडरता से जवाब दिए। महारावल इनकी बेबाकी से अचरज में पड़ गए। बताते हैं कि इन्होंने महारावल विजयसिंह को खासा प्रभावित कर दिया। इसके बाद उन्होंने नाथुसिंह को अपने साथ राज परिवार में रखकर उच्च शिक्षा हासिल करवाई। लेकिन इनके युवा होने की अवस्था में इनके सिर से माता—पिता का साया उठ गया था। इनका 72 वर्ष की आयु में मई 1974 को हिमाचल प्रदेश के शिमला में निधन हो गया।

देश के दूसरे व्यक्ति
नाथूसिंह राठौड़ की शिक्षा मेयो कॉलेज से हुई। इसके बाद यह रॉयल मिलिट्री कॉलेज सैण्डहसर्ट (इंग्लैण्ड) गए। यहां से सेना के अधिकारी बनने का प्रश़िक्षण व गुर सीखे। महाराजा राजेन्द्रसिंह जड़ेजा के बाद भारत में नाथूसिंह दूसरी शख्सियत थी जिन्होंने वहां से प्रशिक्षण हासिल किया। डूंगरपुर रियासत के आग्रह पर मेवाड़ सेना में सेवा दी। इसके बाद वर्ष 1925 में राजपूत रेजिमेंट ज्वाईन किया। डेक्क​न व अफगानिस्तान के साथ अन्य जगहों पर सेवाएं दी। इन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के समय बर्मा में विभागीय कंमाडर के रूप में रहे। इन्होंने सेना में सर्वश्रेष्ठ स्थान वर्ष 1947 में पाया। इनका प्रशिक्षण एवं मूल्यांकन निरीक्षक के तौर पर चयन​ किया। 1951 में पूर्वी सेना के कमांडर के रूप में नियुक्त हुए।

यह बन जाते भारतीय सेना के कमांडर इन चीफ
आधुनिक भारतीय सेना के जन्मदाता के रूप में इनका नाम भी जाना जाता है। भारतीय सेना में इनके योगदान को भूलाया नहीं जा सकता है। इनका नाम सेना में आज भी सम्मान से लिया जाता है। ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण कई समस्याए भी हुई, लेकिन अपनी बात पर हमेशा अडिग रहे। 1947 में उस समय रक्षा मंत्री सरदार बलदेव सिंह ने सेवानिवृत्त जनरल रॉय बुचर को प्रतिस्थापित करने के लिए भारतीय सेना के कमांडर-इन-चीफ की पद की पेशकश की गई, लेकिन नाथुसिंह ने अस्वीकार कर दिया।

वर्ष 1964 में आएं थे वागड़
ठाकुर वीरेंद्रसिंह बताते हैं कि वर्ष 1964 में पीठ जागीर में वैवा​हिक आयोजन के दौरान मुलाकात हुई थी। उनका व्यक्तित्व ही आदर्श है। इस दौरान कई लोगों ने उनका हाल चाल पूछा। उनका व्यवहार सभी को पसंद आता था। अब इनके तीन पुत्र है। इनमें से एक पुत्र नेवी में सेवाएं दी।

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7 Thoughts to “वागड़ की शख्सियत नाथूसिंह राठौड़, जिन्हें इंडियन आर्मी करती है याद..”

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