नीला पानी, बस इस पल का होता है वर्षभर इंतजार…

neelapani fair place

राजेश पटेल, डूंगरपुर। मेला हमारी संस्कृति का हिस्सा है। गांवों में लगने वाले मेले में ग्रामीण संस्कृति का दर्शन होता है। बेणेश्वर व रथोत्सव के बाद नीलापानी मेले की पहचान बरसों से कायम है। परंपराओं पर आधारित यह मेला ऐतिहासिक है। देव दिवाली का यह मेला पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है। यहां तक कई प्रतियोगी परीक्षाओं में इस पर सवाल पूछा जा चुका है। वर्षभर साधु इस नीलापानी मेले के आने का इंतजार करते हैं। कई साधु पैदल चलकर यहां पहुंचते हैं। यहां चौदस को कुंड में स्नान के लिए साधु—संत व तांत्रिकों का जमावड़ा रहता है। साधु संत कहते हैं कि यहां के महत्व को शब्दों में भी बयां नहीं किया जा सकता है। दो नदियों का बहता पानी, गौमुख से निकलता पानी और शिव की शरण के कारण हर कोई बरबस चल पड़ता है। 

neelapani fair place
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तड़के तीन बजे से साधु संत और भक्त नीला पानी स्थित स्नान कुंड में डूबकी लगाते हैं। मान्यता के अनुसार इस कुंड में नहाने से भूत प्रेत, बुरी आत्माओं से मुक्ति मिलती है। कई लोग आत्म शांति के लिए इस कुंड में स्नान करते हैं। बताते हैं कि मेला शुरू होने से एक दिन पहले ही तांत्रिक व साधु संतों का आना शुरू हो जाता है। इस दिन हजारो की संख्या में लोग इस कुंड में डूबकी लगाते है। चौदस की सुबह भक्त अपने पूर्वजों की याद में भजन कीर्तन करते हैं और उनकी अस्थियो का विसर्जन करते हैं। इस दिन श्रद्धालु नीलकंठ महादेव मंदिर में दर्शन करते है। महिलाएं दीपदान करती है। दान पूण्य का कार्य किया जाता है। हिंदु धर्म मेंं आराधना व साधना का अपना महत्व है। साधना से सिद्धियां हासिल होती है। साधु संत व तांत्रिक वर्ष भर साधना में लग रहते हैं। बताते हैं कि नीलापानी मेले में कुंड में स्नान करने के साथ सिद्धिया प्राप्त करने की शुरूआत होती है। तंत्र—मंत्र—यंत्र साधना में महारथी बन जाते हैं। 

प्राचीन गुफा
gufa in neel kanth mahadev mandir

डूंगरपुर जिला मुख्यालय से 15 किमी दूर करौली ग्राम पंचायत में नीलापानी मेला लगता है। पहाड़ों और नदियों के संगम तट पर आयोजित होने वाला मेला सादगी और सुंदरता का मनोरम स्थल है।यह हर वर्ष देव दिवाली पर आयोजित होता है। तीन दिवसीय मेले की शुरूआत कार्तिक शुक्ल चौदस से होती है। पुजारी कोद​र गिरी ने बताया कि नीलकंठ मंदिर करीब 600 वर्ष पुराना है। बाद में इसका जीर्णोद्धार किया गया। ऐतिहासिक गुफा पूरे पहाड़ में फैली है।

मामुश्री माताजी की प्रतिमा
मामुश्री माताजी की प्रतिमा

नीला पानी स्थान दो नदियों का संगम है। यहां पर सापण और घुमराव नदी आपस में मिलती है। वहीं गौमुख से पानी हमेशा बहता रहता है। इसलिए तीन तरह का पानी मिलता है। वागड़ी में इसे लीलापानी का मेला कहते हैं, लेकिन वास्तविक रूप से इसे नीला पानी का मेला ही कहा जाता है। नीलकंठ महादेव मंदिर में शिवलिंग स्थापित है। पानी व नीलकंठ के कारण नीलापानी नाम मिल गया।

नीलकंठ महादेव मंदिर
नीलकंठ महादेव मंदिर

मेले में एक तरफ करिया पहाड़ की प्राकृतिक सुंदरता है। दूसरी तरफ नीलकंठ महादेव मंदिर श्रद्धालुओं को सहज आकर्षित करता है। चौदस को प्रतिवर्ष लगने वाले मेले में करिया पहाड़, गाय मुख से बहता पानी, स्नान कुंड, मामुश्री माता का मंदिर और कंकाल महाराज की धूणी दर्शनार्थियों को आकर्षित करती है। मंदिर के पीछे ही मामुश्री माताजी की मूर्ति स्थापित है। इसी के पास ऐतिहासिक गुफा भी बनी हुई है।

नीलकंठ महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग
नीलकंठ महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग

बताते हैं कि इस नीलापानी कुंड में स्नान करने के लिए राजस्थान सहित गुजरात से भी श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। शामलाजी, भीलोड़ा, बलीचा, विजयनगर, खेरवाड़ा,रानी—छानी आदि प्रमुख है। इस मेले में किसान अधि​क संख्या में पहुंचते हैं। क्योंकि वह दिवाली के बाद धन धान की समृद्धि होने से मेले में खरीदारी करता है। अपने हाथों से खेतों में पैदा की गई उपज को भी इस मेले में विक्रय करता है।

यह पढे: एक हजार वर्ष पुरानी मोडी माता की प्रतिमा।

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