जिसने ये नहीं खाया, उसकी जिदंगी किस काम की…

डूंगरपुर। मेहंदी रंग लाती है, सूख जाने के बाद। चना खाने की याद आती है, निकल जाने के बाद। फूल है गुलाब का, कली किस काम की, जिसने चने नहीं खाये, उसकी जिंदगी किस काम की। तेल के पीपों को काटकर बनाए गए डिब्बों पर यह पंक्तियां नजर आती है। इन पक्तियों के साथ नवल भाई का चना मसाला का व्यापार बरसों से चल रहा है। इनकी अपनी चलती फिरती दुकान है।

डूंगरपुर के नवलभाई चना जोर गरम वाले...
डूंगरपुर के नवलभाई चना जोर गरम वाले…

नवलभाई चने वाले को डूंगरपुर शहर के बुजुर्ग, अधेड़ समेत ग्रामीण अंचल में हर कोई जानता है। यह पिछले 20 वर्ष से डूंगरपुर जिले में चना मसाला बेचने का काम कर रहे हैं। यह शहर की हर दुकान, गलियों तक अपनी पहुंच रखते हैं। कई व्यापारी इनके चना मसाला का स्वाद चखने इंतजार करते दिखते हैं। यह आवाज लगाते है, कई लोगों के कदम थम जाते हैं। हर रोज शाम चार बजे से चना मसाला बेचने का सफर शुरू होता है, जो शाम साढे सात व आठ बजे तक चलता है।

जिनकी चने से पहचान, इनकी चलती फिरती दुकान।
जिनकी चने से पहचान, इनकी चलती फिरती दुकान।

पोरबंदर से किया चना मसाले का सफर शुरू
45 वर्षीय नवलभाई कहते हैं कि 15 वर्ष की उम्र में ही गुजरात के पोरबंदर से चना मसाला हाथ से बनाने व बेचने का सफर शुरू किया। गुजरात से डूंगरपुर आकर पिछले 20 वर्ष से चना बेच रहे हैं। पहले 10 पैसे में चना मसाला बेचते थे। अब इसका दाम दस रुपये हो गया है। 14—15 वर्ष की उम्र में गले में जब डिब्बे को लटकाते थे। उस समय हाईट कम होने के कारण परेशानी होती थी। लोग खुद अपने हाथों से डिब्बे से कागज में चना मसाला बनाकर लेते थे। ओर पैसा दे दे जाते थे। इसका स्वाद ही लोगों की पसंद बना हुआ है।

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खेरवाड़ा से आते हैं रोजाना
राजस्थान के धौलपुर निवासी नवलभाई रोजाना खेरवाड़ा से 20 किमी दूर डूंगरपुर आते हैं। यह बताते हैं कि हमारे साथ आठ लोग भी चना मसाला बेचने का काम करते हैं। परसाद से लेकर खेरवाड़ा व डूंगरपुर तक हर जगह चना मसाना बिकता हैं। लोग खुद इंतजार करते हैं। दिन में इसे तैयार करने का काम होता है। शाम होते ही इसे यहां वहां बेचते हैं। यह कहते हैं कि 10 पैसे से लेकर एक रुपये वाला दौर भी देखा है, लेकिन चना मसाला के स्वाद में इतने वर्षो बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ा है। यही स्वाद व डिब्बा ही बरसों से विश्वास व पहचान लिए कायम है।

गुजरात के हिम्मतनगर से लिया गया फोटो। जहां डिब्बे पर कोई टैगलाइन नहीं थी।

वागड़ दर्शन की टीम द्धारा पड़ताल करने पर सामने आया ​कि वागड़ व मेवाड़ में टैगलाइन के जरिये चना मसाला बेचा जाता है। जबकि गुजरात में बिना टैगलाइन के ही बिक्री होती है। चना बेचने वालों का कहना है कि टैगलाइन का अपना महत्व होता है।

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