विश्वास एवं साख से बनी थी घी वाले ओटले की पहचान…

dungarpur

सागवाड़ा डूंगरपुर जिले का एक शहर। जिसकी पहचान फिलहाल सोने—चांदी के व्यापार से हैं। यहां लोग दूर—दूर से सोने की खरीदी के लिए आते है। आज भी वागड़ में सोने की खरीदी के लिए अधिकतर लोग सागवाड़ा शहर को ही पंसद करते हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब इसकी पहचान घी की शुद्धता की वजह से थी। यहां रोज घी की मंडी सजती थी। कणीदार रबड़ी जैसा घी गांवों से मटकों में आता था। किसान व पशुपालक माथे पर मटकों को रखकर पैदल ही चल पड़ते थे।

कहते हैं कि 75 वर्ष पहले यहां एक ऐसी जगह भी थी कि जिसे घी वाला ओटला कहा जाता था। लोग ढुंढते हुए यहां तक आते थे। बताते हैं कि जैसा घी का स्वाद होता था, वैसा ओर कहीं नहीं मिलता था। उस समय रेबारी भी घी बेचने के लिए व्यापारियों के पास आते थे। डूंगरपुर जिले के अलावा पड़ोसी जिलो से लोग ढुंढते हुए खरीदी के लिए पहुंचते थे। शुद्ध घी के इस व्यापार के पीछे बड़ी वजह थी एक विश्वास और दूसरा साख। उस दौर का सागवाड़ा इन दोनों ही बातों पर खरा उतरा। बदलते दौर के साथ घी का यह व्यापार तो खत्म हो गया। लेकिन कुछ लोगों की जुबां पर भूली बूसरी यादें जरूर रह गई, जो बरबस याद आ जाती है। बुजुर्ग कहते हैं कि वह दिन बहुत अच्छे थे। व्यापार सिर्फ विश्वास था। 100 प्रतिशत शुद्धता थी। सबसे खास बात यह भी ​है कि आज घी का मूल्य ​हर किसी को पता है, कोई उधारी में घी नहीं देता है, लेकिन उस समय घी को खाने व अच्छा ​लगने पर ही कई बाद मूल्य अदा किया जाता था। मूल्य अदा करने पर दो से तीन माह का समय लग जाता था।

बर्तनों से होती थी पहचान…
लोग कहते हैं जिन बर्तनों को लेकर किसान व पशुपालक चलते थे, उससे ही पता चल जाता था कि यह छाछ की मटकी है, ओर यह घी की मटकी। गांवों से जिन मटकों में घी भरकर आता था। वह अलग प्रकार के ही बर्तन होते थे। वैसे बर्तन बहुत कम लोगों के पास अब नजर आते हैं। गांवों से आने वाले घी की मटकी को ही व्यापारी पूरी खरीद लेते थे। घी को जांच परखकर उसका दाम तय होता था। हालांकि पिछले दिनों टामटिया क्षेत्र से जानकारी लेने पर ऐसे बर्तन होने की जानकारी सामने आई।

गर्भवती के लिए घी की ​होती थी खरीद
वह समय ऐसा था कि यहां घी भी अलग अलग प्रकार का मिलता था। देशी गाय से निर्मित, भैंस का गाढ़ा दुग्ध से घी तैयार किया जाता था। शादी विवाह के आयोजन के अलग प्रकार का घी उपलब्ध होता था। धर्म—कर्म के कार्यो के लिए अलग किस्म का घी। मृत्यु व सूतक आदि के दौरान भी घी अलग उपलब्ध होता था। वहीं गर्भवती महिलाओं के लिए लोग दूर दूर से घी वटा की दुकान पर घी खरीदने के लिए आते थे। लोग पत्राचार के जरिये घी उपलब्ध होने व भिजवाने का संदेश देते थे। वहीं घरेलू कार्य के लिए भी घी अलग प्रकार का उपलब्ध हो जाता था। बुजुर्ग कहते हैं कि वह दौर था घी में मिलावट की कोई गुजाइंश नहीं होती थी। किसान व पशुपालक खुद कह देते हैं कि खराब निकल जाए तो पैसा मत देना।

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