घर घर में यहां के पत्थर, तभी कहते हैं बलवाड़ा की पट्टियां

डूंगरपुर। वागड़ की धरा प्राकृतिक संपदाओं से भरपूर है। यहां आपको भांति भाति के पत्थर, वनस्पति व मिट्टी नजर आएगी। बलवाड़ा की पट्टिया बरसों से वागड़ की पहचान रही है। वागड़ के गांव, ढाणियो, फलों, बस्तियों से लेकर मंदिरों में बलवाड़ा की पहचान झलकती है। बरसो पहले इन पत्थरों को हथौड़े व टांकले से निकाला जाता था। अब इसके लिए नये तरीके इजाद किए है। पुराने घरों की फर्श पर यह पत्थर नजर आ जाएगा। 

गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि डूंगरपुर के कई घरों में यही पत्थर है। बलवाड़ा गांव डूंगरपुर से पास होने के कारण इसे शहर ले जाने में आसानी रहती थी। रियासतकाल के समय में पत्थर कम दाम या मुफ्त में मिल जाता था। कई लोग बैलगाड़ी लेकर आते, ओर ले जाते। कुछ लोगों के हाथ से खींचकर ले जाने के बारे में भी सुना है। इस गांव की पहचान ही पत्थरों के कारण है, आज भी लोगों से सुनते हैं बलवाड़ा की पट्टियां। ग्रामीण कहते हैं कि आ पाणो घणो काटो हतो। यह पत्थर बहुत ही मजबूत था।

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अकेले पत्थरों को जमाकर बनाया बलवाड़ा गांव में घर

वैसे बलवाड़ा गांव डूंगरपुर जिला मुख्यालय से नौ किलोमीटर की दूरी पर है। शहर से गैंजी मार्ग की तरफ बढ़ने पर आपको आठ किमी की दूरी पर आपको पत्थरों की लम्बी लम्बी पट्टिया नजर आएगी। यहां अंदर प्रवेश करते ही आपको दोनों तरफ बड़े बड़े पत्थर भी स्वागत द्वार की तरह लगे नजर आएंगे। कच्चे रास्तों से अंदर प्रवेश करने पर यहां पत्थरों के मकान नजर आएंगे। सड़क किनारे दोनों तरफ बलवाड़ा पट्टिया दिख जाएगी। जहां आज लोग अपने बैठने के लिए बैंच बनवाते है, वहीं इन लोगों ने पत्थरों का प्रयोग कर बैंचनुमा ही बनाया।

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बैठने के लिए पत्थरों से जमाया बैंचनुमा

इस धरा की खासियत यह है कि यहां पर सिर्फ पत्थर ही पत्थर नजर आएगा। थोडी सी मिट्टी हटते ही पत्थरों की परत सामने आ जाएगी। दूर से पत्थरों की मजबूती देखने को मिल जाएगी। ग्रामीण कहते हैं कि ग्रामीण कहते हैं कि यहां अलग अलग साइज के पत्थर निकलते है। इनकी मोटाई भी अलग अलग रहती है। पहले इस पत्थर की बहुत डिमांड थी, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में आज भी इसकी महत्ता बरकरार है। शहर में अब नये मकानों में मार्बल का प्रयोग किया जाने लगा है। इसके लिए इन पट्टियों का निकाला कर बेचा जा रहा है।

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इनसे ही गेपसागर की सीढियों का निर्माण
डूंगरपुर शहर की गेपसागर झील बहुत ही ऐतिहासिक है। यहां की सीढ़ियों का निर्माण बलवाड़ा पत्थर से किया गया है। पहले भी यहां बलवाड़ा के पत्थर का ही प्रयोग किया गया था। अब फिर से उसी पुरातन पत्थर को प्रयोग में लाया गया है। इसके अलावा वागड़ के प्राचीन कई मंदिरों की फर्श व सीढ़ियों पर यह पत्थर देखने को मिल जाएगा।

इन पत्थरों की मोटाई दिखाते गांव के कन्हैयालाल

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40 प्रतिशत लोग गुजरात में
गांव के वार्डपंच कन्हैयालाल डामोर कहते हैं कि तीन इंच के बाद पत्थर आ जाता है। यहां के कई लोग इन पत्थरों के कार्य करते हैं। बाहर के लोगों ने भी इन पत्थरों को परखा है। ग्रामीण बताते हैं कि गांव के 40 प्रतिशत लोग गुजरात में मजदूरी करते हैं। यहांं की भूमि में पत्थर अधिक है, इसलिए गेहूं व मक्का की पैदावार होती है, लेकिन बहुत कम मात्रा में। कृषि कार्य अच्छा नहीं होने के कारण पलायन करना पड़ता है। त्योहारों के दिनों में घर आते हैं। हालांकि कुछ लोगों को गांव में इन पत्थरों से रोजगार मिल रहा है। यहां के कई लोग खुद काम भी कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि अब रोजगार कम हुआ है। इसलिए गुजरात जाकर मजदूरी करते हैं। खेती में इतना मुनाफा नहीं मिल पाता है। 

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