डर, उदासी, विरक्ति और चांद…

डायरी / कुमार अजय रात के दस बजने को है। कांकाणी का वही ढाबा है, पंकज उधास की गजलें सुनकर लौटते हुए जहां कभी कढ़ी-सोगरे का स्वाद चखा था। कढी के साथ सेव-टमाटर, छौंकी हुई हरी मिर्च और दही डालकर चूरी हुई बाजरी की रोटी में जब ढाबे वाला लड़का देसी घी की ‘मिरकली’ डालता है तो दिल चाहकर भी मना नहीं कर पाता जबकि आम दिनों में तो घी लगभग वर्जित ही है। मोटापा, बीपी, डायबिटीज और जाने क्या-क्या डर। डर अपनी जगह झूठे भी नहीं। लेकिन कभी-कभी सारे…

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