चोर भी भूल गए चोरी करना, पुरातन विभाग ने माना महत्वपूर्ण!

बांसवाड़ा जिले का अंदेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय मंदिर

बांसवाड़ा के अंदेश्वर पार्श्वनाथ अतिशय मंदिर को वागड़ क्षेत्र में हर कोई जानता है। कार्तिक पुर्णिमा यहां के लिए अहम दिन होता है। इस दिन अंदेश्वर भगवान प्रगट हुए थे। इस प्रतिमा को 12वीं या 13 वीं शताब्दी माना जाता है। पुरातन विभाग ने इस मूर्ति को अध्यात्म की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना है। भगवान पार्श्वनाथ की यह प्रतिमा अंदेश्वर पार्श्वनाथ के नाम से देशभर में विख्यात है। इस प्रतिमा के पीछे कई किंवदंतियां है कि एक बार चोर यहां चोरी करने के लिए आए। चांदी के दरवाजों को निकाल दिया,…

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क्या आपने देखा है यह स्कूल, जिसकी दीवारें बोलती है…

डूंगरपुर जिले का हिम्मतपुरा राजकीय प्राथमिक विद्यालय

-टाई पहने, आई कार्ड लटकाए अध्ययन करते हैं विद्यार्थी सरकारी स्कूलों की स्थिति से हर कोई वाकिफ है। यहां कक्षाकक्षों के साथ संसाधनों की कमी झेलनी पड़ती है। राजस्थान के वागड़ क्षेत्र में एक सरकारी प्राथमिक स्कूल ऐसा भी है जो निजी विद्यालयों को भी मात देता है। इसे देखकर सरकारी स्कूल के प्रति हर किसी की सोच बदल जाती है। इस स्कूल के विद्यार्थी टाई पहने, गले में आई कार्ड लटकाए निजी स्कूलों की तरह अध्ययन करते नजर आते हैं। डूंगरपुर जिले के हिम्मतपुरा राजकीय प्राथमिक विद्यालय की हिम्मत…

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नीला पानी, बस इस पल का होता है वर्षभर इंतजार…

neelapani fair place

राजेश पटेल, डूंगरपुर। मेला हमारी संस्कृति का हिस्सा है। गांवों में लगने वाले मेले में ग्रामीण संस्कृति का दर्शन होता है। बेणेश्वर व रथोत्सव के बाद नीलापानी मेले की पहचान बरसों से कायम है। परंपराओं पर आधारित यह मेला ऐतिहासिक है। देव दिवाली का यह मेला पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध है। यहां तक कई प्रतियोगी परीक्षाओं में इस पर सवाल पूछा जा चुका है। वर्षभर साधु इस नीलापानी मेले के आने का इंतजार करते हैं। कई साधु पैदल चलकर यहां पहुंचते हैं। यहां चौदस को कुंड में स्नान के लिए…

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सात बैलगाडी टूटी, फिर स्थापित कर दी प्रतिमा

डूंगरपुर जिले का प्रसिद्ध मांडविया हनुमान मंदिर

राजेश पटेल व विशाल कलाल की संयुक्त रिपोर्ट : डूंगरपुर जिले का चमत्कारिक मांडविया हनुमान मंदिर आस्था का ऐसा परम धाम है, यहां भक्त की हर मनोकामना पूर्ण होती है। जिला मुख्यालय से 26 किमी की दूरी पर स्थित इस मंदिर में हर शनिवार को श्रद्धालुओं का मेला लगता है। सिर्फ डूंगरपुर—बांसवाड़ा ही नहीं, विभिन्न स्थानों से लोग दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। मंदिर से जुड़ी किवदंती यह है कि देवली माता टेम्बा के पास किसी आदिवासी समाज के व्यक्ति को स्वप्न आया। घटिया घरा स्थित क्षेत्र में हनुमानजी…

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150 परिवार में हर घर से एक व्यक्ति विदेश..

डूंगरपुर। जीवन में हर कोई एक बार विदेश जाने की चाह रखता है। विदेश में रोजगार मिलना भी कोई आसान काम नहीं है। पहली बार विदेश जाने वाले युवाओ को रोजगार के लिए कई दिन तक भटकना पड़ता है। डूंगरपुर जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां 150 परिवारों में हर घर से एक व्यक्ति रोजगार की चाह में विदेश रहता है। जिला मुख्यालय से सात किमी की दूरी पर स्थित मोकरवाड़ा गांव के युवा कतर, कुवैत, इजरायल, बहरीन, इराक आदि देशों में कार्य कर रहे हैं। इस गांव…

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दिवाली पर कैसे चेहरे पर आती है मुस्कुराहट!

वागड़ में मेरियू की परंपरा नववर्ष यानि गोवर्धन पूजा के दिन तड़के पांच बजे से शुरू हो जाती है। यहां बच्चों की तरफ से आल दिवारी, काल दिवारी, पमणे दाड़े घोर दिवारी, मेरियू..मेरियू..मेरियू का संबोधन किया जाता है। इससे आगे की पक्तियां सुनना भी रोचक होता है। बच्चों द्वारा संबोधन के पास मेरियू में तेल पुरवने के साथ सिक्कों का आना ही चेहरे पर मुस्कुराहट ला देता है। आपके लिए हम पुरा वीडियो लेकर आए है।

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आवी गया पामणा, दिवारी आणू हे…

दिवाली आणा की अनूठी परपंरा सिर्फ वागड़ के डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिले में देखने को मिलती है। नवदंपत्ति की पारिवारिक जीवन की शुरुआत इस दिन से होती है। यह खास परंपरा नव दम्पति के लिए ही है। इस साल शादी करने वाले पुरुष ससुराल अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ पत्नी को लेने जाता है। यहां सभी का स्वागत व मान मनुहार किया जाता है। मिठाई बांटी जाती है। हंसी—ठिठोली होती है। पटाखे छोड़कर खुशियां मनाई जाती है। उस दौरान दुल्हे को भेंट स्वरूप आभूषण व वस्त्र दिए जाते हैं।…

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जाने क्या है थाणा की रामणा रस्म…

वागड़ अंचल में दीपावली पर्व पर कई परंपरा व रीति​ रिवाज है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से पांच किमी की दूरी पर स्थित है थाणा गांव। कभी इस गांव को शाला शाह थाणा कहा जाता था। इस गांव में दीपावली पर्व अनूठे तरीके से मनाया जाता है। यहां गन्ने और पताशे बांटकर दिवाली मनाई जाती है। जिसे स्थानीय बोली में रामणा कहते हैं। बताते हैं कि गांव के चौराहे पर सभी जाति धर्म के लोग एकत्रित होते हैं। किसान अपनी अपनी इच्छानुसार गन्ने की भारियो को रखते हैं। यहां गन्ने के…

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पाड़वा गांव 10 वर्ष तक रहा था विधानसभा क्षेत्र

डूंगरपुर। सागवाड़ा शहर से 14 किमी की दूरी पर स्थित पाड़वा गांव कभी जिले ​का विधानसभा क्षेत्र हुआ करता था। इस बात को 41 वर्ष बीत गए। वह समय था जब पाडवा अपने आप में विधानसभा क्षेत्र था। इस गांव की अपनी राजनीतिक पकड़ थी। आज भी इसकी पकड़ बनी हुई है। कभी स्वयं विधानसभा क्षेत्र क​हलाने वाला यह गांव, आज 14 किमी की दूरी पर स्थित सागवाड़ा विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा बना हुआ है। हालां​कि आसपुर विधानसभा क्षेत्र को समाप्त कर ही इसे मुख्यालय बनाया गया था। यह गांव…

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डर, उदासी, विरक्ति और चांद…

डायरी / कुमार अजय रात के दस बजने को है। कांकाणी का वही ढाबा है, पंकज उधास की गजलें सुनकर लौटते हुए जहां कभी कढ़ी-सोगरे का स्वाद चखा था। कढी के साथ सेव-टमाटर, छौंकी हुई हरी मिर्च और दही डालकर चूरी हुई बाजरी की रोटी में जब ढाबे वाला लड़का देसी घी की ‘मिरकली’ डालता है तो दिल चाहकर भी मना नहीं कर पाता जबकि आम दिनों में तो घी लगभग वर्जित ही है। मोटापा, बीपी, डायबिटीज और जाने क्या-क्या डर। डर अपनी जगह झूठे भी नहीं। लेकिन कभी-कभी सारे…

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