दिवाली पर कैसे चेहरे पर आती है मुस्कुराहट!

वागड़ में मेरियू की परंपरा नववर्ष यानि गोवर्धन पूजा के दिन तड़के पांच बजे से शुरू हो जाती है। यहां बच्चों की तरफ से आल दिवारी, काल दिवारी, पमणे दाड़े घोर दिवारी, मेरियू..मेरियू..मेरियू का संबोधन किया जाता है। इससे आगे की पक्तियां सुनना भी रोचक होता है। बच्चों द्वारा संबोधन के पास मेरियू में तेल पुरवने के साथ सिक्कों का आना ही चेहरे पर मुस्कुराहट ला देता है। आपके लिए हम पुरा वीडियो लेकर आए है।

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यहां 250 वर्ष पूर्व खुदाई में मिला मिट्टी का दीपक और खंडहर मंदिर

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दीपावली पर्व पर विशेष : वागड़ का महालक्ष्मी माता मंदिर डूंगरपुर जिले में पहाड़ों पर ही देवी मंदिर देखने को मिल जाएंगे। इस दीपावली पर्व पर हम आपको वागड़ के ऐसे महालक्ष्मी मंदिर के बारे में बताने जा रहा है, जो सदियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहा, लेकिन 200 वर्ष पहले तक गुमनाम सा रहा। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से सीमलवाड़ा मार्ग पर 46 किमी की दूरी पर स्थित झलाई गांव में करीब 250 वर्ष पूर्व पहाड़ी पर खुदाई के दौरान मिट्टी का दीपक एवं मंदिर का खंड़हर मिला था।…

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नी मल्यो हेड़ों, इतना लंबा है वागड़ का हेड़ा गीत

राजेश पटेल, डूंगरपुर। ‘हेड़ा’ गीत नाम थोड़ा अजीब जरूर है, लेकिन नामकरण के पीछे भी एक तथ्य है। वागड़ में कहते हैं कि हेड़ों नी मल्यो। मतलब जिसका अंतिम छोर नहीं मिलता है। यह गीत ऐसा है कि शुरू होने के बाद इसका अंत नहीं होता है। यह गीत इतना लंबा है कि दो से तीन दिन लगातार गाने के बाद भी खत्म नहीं होता है। इसे वागड़ी बोली में ही गाया जाता है। जनजाति बहुल डूंगरपुर-बांसवाड़ा जिले में कई बुजुर्ग इसे गाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के लोगों को…

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आवी गया पामणा, दिवारी आणू हे…

दिवाली आणा की अनूठी परपंरा सिर्फ वागड़ के डूंगरपुर व बांसवाड़ा जिले में देखने को मिलती है। नवदंपत्ति की पारिवारिक जीवन की शुरुआत इस दिन से होती है। यह खास परंपरा नव दम्पति के लिए ही है। इस साल शादी करने वाले पुरुष ससुराल अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ पत्नी को लेने जाता है। यहां सभी का स्वागत व मान मनुहार किया जाता है। मिठाई बांटी जाती है। हंसी—ठिठोली होती है। पटाखे छोड़कर खुशियां मनाई जाती है। उस दौरान दुल्हे को भेंट स्वरूप आभूषण व वस्त्र दिए जाते हैं।…

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जाने क्या है थाणा की रामणा रस्म…

वागड़ अंचल में दीपावली पर्व पर कई परंपरा व रीति​ रिवाज है। डूंगरपुर जिला मुख्यालय से पांच किमी की दूरी पर स्थित है थाणा गांव। कभी इस गांव को शाला शाह थाणा कहा जाता था। इस गांव में दीपावली पर्व अनूठे तरीके से मनाया जाता है। यहां गन्ने और पताशे बांटकर दिवाली मनाई जाती है। जिसे स्थानीय बोली में रामणा कहते हैं। बताते हैं कि गांव के चौराहे पर सभी जाति धर्म के लोग एकत्रित होते हैं। किसान अपनी अपनी इच्छानुसार गन्ने की भारियो को रखते हैं। यहां गन्ने के…

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अच्छा, तो इस तरह बनता है मिट्टी का दीपक…

दीये बनाने की तैयारी में जुटा कुंभकार

इस दीपावली पर मिट्टी के दीपकों से घर को रोशन करने का संकल्प लें। ​एक कुंभकार दीपको को किस तरह से तैयार करता है। आप यहां देख सकते हैं। आप सभी की उम्मीदों पर ही यह दीपक तैयार करने का कार्य करता है। मिट्टी के दीपक हमारी संस्कृति का हिस्सा है। आप सभी इस बार मिट्टी के दीपक का ही प्रयोग करें। देखे कैसे बनते मिट्टी के दीपक। जाने, वागड़ के काला बादल को। क्लिक करें  https://bit.ly/2CTqr5t

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दारू दुकड़ा आलवा वारा, लोकतंत्र ना हैं इ हत्यारा।

बांसवाड़ा। गुजराती में ‘जो बका’ के संबोधन की तरह वागड़ी में ‘ए…हामरो’ (ए सुनो) संबोधन प्रसिद्ध है। इस टेगलाईन को ​बांसवाड़ा निर्वाचन विभाग ने अपनाया है। इनका यह नवाचार बिल्कुल हटकर है। राजनेताओं के हाइटेक चुनाव प्रचार के बीच बांसवाड़ा निर्वाचन विभाग की मतदाता अपील पर हर किसी की नजर जा रही है, कारण मतदाता अपील का अनूठा तरीका । ए…हामरो’…की यह स्टीकर श्रृंखला भावनात्मक अपील के रूप में मतदाता को मतदान से जोड़ने के लिए सटीक है। इसकी चर्चा भी हर जगह हो रही है। वहीं निर्वाचन विभाग भी…

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मशीनों से नहीं, बैलों से होती है धान फसल की मढ़ाई

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राजेश पटेल। तकनीकी युग में मशीनरी का प्रयोग हो रहा है, लेकिन बैल व बैलगाडी किसान की खेती का पहिया है। जब तक किसान खेती के लिए बैल व बैलगाडी का प्रयोग नहीं करता है। उसे खेती में अपनत्व का अहसास नहीं होता है। खेती का कार्य अधूरा—अधूरा सा लगता है। कई किसान कृषि की पुरातन परंपराओं को सहेजे रखने के लिए बैल व बैलगाडी को अधिक तवज्जो देते हैं। धान की मढाई का मजा बैलो के साथ ही है। धान के पौधों से चावल अलग करने के लिए बैलों की…

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विश्वास एवं साख से बनी थी घी वाले ओटले की पहचान…

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सागवाड़ा डूंगरपुर जिले का एक शहर। जिसकी पहचान फिलहाल सोने—चांदी के व्यापार से हैं। यहां लोग दूर—दूर से सोने की खरीदी के लिए आते है। आज भी वागड़ में सोने की खरीदी के लिए अधिकतर लोग सागवाड़ा शहर को ही पंसद करते हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब इसकी पहचान घी की शुद्धता की वजह से थी। यहां रोज घी की मंडी सजती थी। कणीदार रबड़ी जैसा घी गांवों से मटकों में आता था। किसान व पशुपालक माथे पर मटकों को रखकर पैदल ही चल पड़ते थे। कहते…

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जहां मिली थी ईंट, अब बन रहा हनुमानजी का मंदिर

wagad darshan

विशाल कलाल की नजर से : कहते हैं कि ईश्वर कण कण में विराजमान है। निश्चल भाव से बस तलाशने की जरूरत है। आपकी भक्ति में कुछ बात है, भक्त का भगवान से साक्षात्कार हो सकता है। अरावली की इन वादियों में आस्थाएं समायी हुई है। डूंगरपुर जिले का सुराता क्षेत्र घना जंगल है। पहाड़ी क्षेत्र होने के साथ दिन में सड़कें सुनसान नजर आती है। वैसे यह गांव ग्रीन मार्बल की खानों के लिए जाना जाता है। यहां का मार्बल प्रदेश भर में पहुंचता है। यहां बड़े बड़े पत्थरों के…

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