मशीनों से नहीं, बैलों से होती है धान फसल की मढ़ाई

dungarpur

राजेश पटेल। तकनीकी युग में मशीनरी का प्रयोग हो रहा है, लेकिन बैल व बैलगाडी किसान की खेती का पहिया है। जब तक किसान खेती के लिए बैल व बैलगाडी का प्रयोग नहीं करता है। उसे खेती में अपनत्व का अहसास नहीं होता है। खेती का कार्य अधूरा—अधूरा सा लगता है। कई किसान कृषि की पुरातन परंपराओं को सहेजे रखने के लिए बैल व बैलगाडी को अधिक तवज्जो देते हैं। धान की मढाई का मजा बैलो के साथ ही है। धान के पौधों से चावल अलग करने के लिए बैलों की गोल गोल दौड़, रूक—रूक चलाना ही अनोखा आकर्षण है। बैलों की आवाज का सुनाई देना। बैलों से खेती करने में भले ही ज्यादा समय लगता है, लेकिन व्यवस्थित खेती तो इसी से होती है। उत्पादन अधिक होता है।

वागड़ में चावल की खेती के प्रति अधिक रूझान है, वहीं देश भी चावल उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। इस बदलते दौर में कई किसान मढ़ाई के लिए तकनीक का सहारा ले रहे हैं, लेकिन वागड़ में कई किसान ऐसे हैं, जो सिर्फ परंपरा को सहेजे हुए है। वागड़ के कई किसान पुरातन कृषि व आधुनिकता को जोड़कर हटकर प्रयास कर रहे हैं, बस उनके कार्य व प्रयास आगे नहीं आ पाते हैं। लेकिन उन्हें इसका मूल्य पता है।

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वागड़ दर्शन की टीम द्वारा गांवों में देखने पर पता चला कि गांवों में किसान आज भी धान के पौधों को काटकर बैलगाडी के जरिये घर के आंगन तक लाते है। बैलों के सहारे मढ़ाई कर धान से चावल को अलग किया जाता है। घर—आंगन व खलिहान में धान के ढ़ेर लगाए जाते हैं। फिर बोरियों में भरकर रखा जाता है। अनाज की कोठियों में जमा किया जाता है। व्यापारियों तक पहुंचाया जाता है। भले ही खेती में तकनीक हावी हो रही है। पैदावार के लिए तकनीक का सहारा लिया जा रहा है। किसान पुरानी पद्धति से गांवों में खेती से जुड़े हुए है। बैलों को आज भी वह अपने परिवार का सदस्य मानते हैं। बिछीवाड़ा क्षेत्र में वागड़ दर्शन की टीम को कृषि का दिग्दर्शन हुआ। किसान खेती के लिए जो नवाचार कर रहे हैं, बस हम उन्हें सामने लाने का कार्य कर रहे हैं।

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